श्रीरामचरित मानस संसार के सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थों में से एक है। गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित इस ग्रन्थ में मानव जीवन के सभी प्रश्नों का उत्त्ज्ञार मिलता है। गोस्वामी जी ने अपने इस महान ग्रन्थ में समाज के प्रत्येक पक्ष का वर्णन किया है। यह एक ऐसा अदभुत ग्रन्थ है जिसको जिस भी दृष्टिकोण से देखा जाये, उसी दृष्टिकोण से ये ग्रन्थ नजर आता है। गोस्वामी जी का ये महान ग्रन्थ अध्यात्मिक भी है, सामाजिक भी है, राजनैतिक भी है और व्यक्तिगत है। इसलिए गोस्वामी तुलसीदासजी न केवल महान अध्यात्मिक विभुति है, बल्कि वे सामाजिक एवं राजनैतिक शास्त्रा के महान विद्वान भी है। वर्तमान में प्रबंधनशास्त्रा की बड़ी चर्चा है। हर व्यक्ति इस विषय पर बात करता हुआ नजर आता है। आधुनिक प्रबंधन में संगठन की महत्वपूर्ण भूमिका है या हम कह सकते है कि किसी भी संगठन की सफलता उसके प्रबंधन पर निर्भर करती है। अगर हम अच्छा प्रबंधन कर पाएं तो हम अपने संगठन को सफलता के शीर्ष पर पहुॅचा सकते है। संगठन कैसा भी हो सकता है, वो राजनैतिक भी हो सकता है, सामाजिक भी हो सकता है, और व्यावसायिक भी हो सकता है।

मैंने श्रीरामचरित मानस को आज के आधुनिक संगठन, उसके प्रबंधन और नेतृत्व के सन्दर्भ में देखने की कोशिश की है। किसी भी संगठन की सफलता उसके उद्देश्य और उसके नेतृत्व के गुणों पर निर्भर करती है। अगर संगठन के उद्देश्य सही हैं और नेतृत्व में सही गुण है तो उस संगठन की सफलता निश्चित है। श्रीरामचरित मानस इस विषयों की उचित तरह से रेखांकित करता है। श्रीरामचरित मानस में सात अध्याय हैं बालकाण्ड से लेकर उत्तरकांड तक। उत्तरकांड में गोस्वामी तुलसीदासजी एक आदर्श संगठन की परिकल्पना करते हैं।

आज के ज्यादातर संगठन सिर्फ अधिक से अधिक धन कमाने को सफलता समझते है तुलसीदासजी उत्तरकांड में एक सफल संगठन की परिकल्पना प्रस्तुत करते है। गोस्वामी जी कहते हैं, दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि व्यापा। गोस्वामीजी के अनुसार वो संगठन सफल हैं जिसमें रहने वाले या काम करने वाले शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक कष्टों से मुक्त है। गोस्वामीजी का संगठन त्रिकोणात्मक है जिसकी एक भुजा शारीरिक सम्पत्ति, दूसरी भुजा मानसिक सम्पत्ति एवं तीसरी भुजा भौतिक सम्पत्ति है। यानि कि जब तक किसी संगठन में काम करने वाले इन तीनों सम्पत्तियों से युक्त नहीं हैं तब तक उस संगठन को सफल नहीं माना जा सकता है। केवल भौतिक सम्पत्ति अर्जित करने को ही सफलता नहीं माना जा सकता है। संगठन को देखना पड़ेगा कि उसमें काम करने वाले व्यक्तियों का मानसिक और शरिरिक स्वास्थ्य भी उत्तम हो। अत: केवल वे ही संगठन सफल माने जाएंगे जिनमें काम करने वाले इन तीनों सम्पत्तियों के मालिक हो। तुलसीदासजी अगले सूत्रा में कहते हैं कि सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत सुति नीति।। ऐसे संगठन जिसमें काम करने वाले परस्पर प्रेम के साथ रह कर एक दूसरे के साथ सहयोग करते हुए अपने अपने काम करते हुए संगठन के उद्देश्य प्राप्ति में लगे रहते है, सफल माने जाएंगे। जहां पर नकारात्मक विरोधाभास हो और लोग एक दूसरे के काम में हस्तक्षेप करते हों, कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं। इसलिए वो संगठन सफल माने जाएंगे जो कि ऐसा वातावरण बना सके जिसमें लोग एक दूसरे को मदद कते हुए अपना अपना काम करें।
पर ऐसा संगठन बनाने एक उच्च कोटि का नेतृत्व चाहिए।
नायक को पता होना चाहिए कि उसको किस वक्त किस प्रक्रिया को चुनना होगा ताकि वो उचित संवाद के साथ आवाश्यक ज्ञान को लोगों तक पहुँचा सके। यानि इस सूत्रा के साथ तुलसीदासजी कहते है कि जिस व्यक्ति में ज्ञान हो, संवाद करने की विशेषता हो और उस प्रक्रिया से परिचित हो जिसके माध्यम से संवाद करके अपने ज्ञान को दूसरों तक पहुंचा सके, वही व्यक्ति सच्चे अर्थों में नायक हो सकता है। और ऐसा नायक ही ऐसे आदर्श संगठन की रचना कर सकता है जिसमें शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक तीनों सम्पत्तियों का वास हो।
