पूरे भारतवर्ष में शादी की अनोखी प्रथा होती है। मिथिलांचल जो माता सीता की जन्मभूमि है। वहां अभी भी वर को काफी आदर सम्मान दिया जाता है। पहले प्रथा ये थी कि लड़के को कम से कम 1 महीना अपने ससुराल रहना पड़ता था। लड़के की विदाई का मुहुर्त निकालने के बाद लड़का अपने घर जा सकता है। परंतु लड़की बिना गौना के अपने ससुराल नहीं जा सकती। लेकिन आज भागदौड़ के युग में ये संभव नहीं है कि लड़का इतने दिन अपने ससुराल रहे, इसलिए समय अभाव के कारण लड़के की विदाई जल्दी ही हो जाती है।
शादी में सबसे पहले वर जब वधु के द्वार पर आता है तो वर को सभी के समक्ष अपने वस्त्र बदलने पड़ते हैं ताकि वर को कोई शारीरिक दोष तो नहीं? फिर विधकरी-एक अनुभवी महिला जिस पर सभी विधि व्यवहार करवाने का जिम्मा होता है। उसके द्वारा परिछन (परीक्षण) के दौरान उससे गृहस्थ जीवन के व्यवहारिक प्रश्न पूछे जाते हैं।
कोहबर में नैना -जोगिन- जिसमे भावी पत्नी और साली को बिना देखे जो कि कपड़े से ढ़की होती है। उसमें से अपनी पत्नी को पहचानना होता है। इसमे लोगों का काफ़ी मनोरंजन तो होता ही है साथ में वर की पारखी नजर समझ में आती है। उसके बाद समाज परिवार के बुजुर्गों के साथ मिल कर ओठंगर कुटा जाता है यानि पूरे समाज की स्वीकृति के साथ गृहस्त जीवन में प्रवेश की अनुमति- चाहे ओठंगर कूटना हो या भाई के साथ मिल कर धान का लावा छीटना, उन तमाम रिवाजों के पीछे कोई न कोई व्यवहारिक तर्क होता है- फिर आम की कच्ची लकड़ियों को प्रज्वलित कर उसके समक्ष मन्त्रें द्वारा विवाह संपन्न करवाया जाता है उस अग्नि पर ही ओठंगर में कुटे धान के चावल से वर खीर बनाता है अर्थात गृहस्तथी में पूर्ण सहयोग की तैयारी- वधु का प्रथम सिंदूर दान अलग सिंदूर (भुसना) से किया जाता है। मतलब अभी वर की परीक्षा संपन्न नहीं हुई है! इसके बाद चौठारी (यानि शादी के चौथे) दिन तक वर एवं वधू नमक का सेवन नहीं करते हैं।

इय विवाह के बाद वर वधू कोहबर के कमरे में जाते हैं। कोहबर को आकर्षक चित्रें द्वारा सजाया जाता है जिसमें सांकेतिक रूप से गृहस्थ जीवन के महत्व को दिखाया जाता है। कोहबर में विधकारी वधू को लेकर आती है और वर-वधू का परिचय कराती है। अगले तीन दिन तक यही कार्यक्रम चलता है। वर-वधू सिर्फ विधकरी के माध्यम से ही मिलते हैं।
चूकि मिथिला प्रभू श्रीराम का ससुराल था इसलिए ये सारी रीति रवाज सदियों से मिथिला की संस्कृति का हिस्सा हैं। दामाद को मिथिला में बहुत ही आदर दिया जाता है। पूरे गांव स्वागत-सत्कार में लगा रहता है। कि कहीं किसी चीज की दिक्कत तो वर को नहीं हो रही है। हास-परिहास का मिथिला में काफी ज्यादा महत्व है। मधुर-मधुर गालियों जब लड़की वाले लड़के के परिवार को देते हैं। तो वर भी उसका बुरा नहीं मानते ये रीति-रिवाज में शामिल होता है। शारदा सिन्हा द्वारा गाए गए मैथिली विवाह गीत शादी में चार-चांद लगा देते हैं।
अब राम विवाह के कुछ प्रसंग:
धनुष भंग हुआ सीता राम विवाह की तैयारी है। दशरथ जी को न्योता भेजा गया। बाराती मिथिला में प्रवेश कर रहे हैं। महिलाएं, लोबा और दही मछली देख कर यात्र का सगुन कर रही है। आज भी मिथिला में दही-मछली के दर्शन से ही यात्र का उत्तम योग बनता है।

चारा चाषु बाप दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।
दाहिन काग सुखेत सुहाबा नकुल दरस सब काहूँ पावा।।
सानकूल बह त्रिबिध बयारी, सघट सबाल आव बार नारी।।
लोवा फिर-फिर दरस देखावा। सुरभि सन्मुख सिसुहि पिआवा।।
सनमुख आएऊ दाढ़ी और मीना कर पुस्तक दुई विप्र प्रवीणा।।
बालकाण्ड/दोहा-302/चौपाई-4
अवध के बारातियों का बहुत ही मधुरता के साथ स्वागत किया मिथिलांचल के लोगों ने। खाने-पीने के बहुत से पकवान एवं मीठी वाणी से अवध के लोगों का मन उल्लास से भर गया।
‘भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भांति न जाहीं बखाने।।
दधि-चिउरा उपहार अपारा। भरि-भरि कांवल चले कहारा।।
बालकांड/दोहा-304/चौपाई-3

बलिहारी जाऊं इस पुनीत परम्परा की। मिथिलांचल में आज भी स्वागत भोज त्रिगुणात्मिका (सत,रज,तम) प्रकृति चूरा-दही चीनी से ही किया जाता है। जनवासे पर बाराती को विश्राम दिया जाता है। विवाहोपरांत वर एवं दुल्हन को सुहाग कक्ष में सखी-सहेलियां मंगल गान करती हुई ले जाती है। वहां होती है एक दूजे की खीर-खिलाई की रस्म लहकौरी। इस खीर में वर-कन्या का एक बंद लहू मिला होता है। ऐसा कहा जाता है कि इसके खाने से परस्पर प्रीति बढ़ती है। लहू मिश्रित कौर के कारण इसे लहकौरी कहा जाता है।
‘कोहबरहि आने कुंवर कुअरि सुआसिनिन्ह सुख पाए कै।
अति प्रीति लौककि रीति लागीं करण मंगल गई कै।
लहकौरी गौरी सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं।
रनिवासु हास विलास रस बस जन् को फल सब लहैं।।
फिर ज्योनार हुआ, मंगल गालियों के साथ। मिथिलावासी अवधवासियों को सरस मीठी बोली के साथ वचन सुना रही है। समधी, समधन के हास्य-परिहास। ‘ऐसन स्वाद न मिलिहैं केकैई के तरकारी में! खीर परोसल थारी में। मिथिला की तो पहचान ही है। पग-पग पोखर, माछ, मखान, सरस बोली मुस्की मुख पान। भोजनोपरांत राजा जनक समधी-समाज को पान देकर पूजते हैं। तब जाकर समधी महाराज जनवासा का रास्ता देखते हैं।
