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दुनागिरि: संजीवनी बूटी का दिव्य रहस्य

उत्तराखंड देवभूमि के नाम से पूरी दुनिया में विख्यात हैं यहां एक से बढ़कर एक देवताओं के मंदिर विराजमान हैं। कहा जाता है कि देवता उत्तराखंड की भूमि पर जरूर दर्शन देते हैं। इनमें से कई मंदिर के बारे में लोगों को ज्ञात ही नहीं है। हिन्दुओं के अराध्य भगवान शंकर, विष्णु, देवी सती की अनेकों मंदिर यहां मिल जाएगी। जिस प्रकार जम्मू कश्मीर में स्थित वैष्णों देवी प्रसिद्ध हैं वैसे ही उत्तरांचल में द्रोण गिरी हैं। जिसे लोग दुनागिरी के नाम से भी जानते हैं। लेकिन प्रचार-प्रसार के अभाव में राष्ट्रीय स्तर पर इसकी महत्ता उभर कर नहीं आ पाई है। जम्मू स्थित वैष्णों देवी की गुफा में देवी भगवती ने असुरों का संहार कर घोर तपस्या की थी और दुनागिरि शक्तिपीठ में उसी महाशक्ति ने उमा हैमवती का रूप धारण कर इंद्र आदि देवताओं को ब्रह्मज्ञान का उपदेश दिया था। यहां देवी भगवती के दो सिद्ध शिला विग्रह है।

 

दुनागिरी के शिखर पर पहुंचते ही विराट हिमालय की गगनचुंबी पर्वत श्रृंखलाएं अत्यंत निकट दिखाई देती है। ऐसा लगता है वास्तव में हम हिमालय के आंगन में पहुंच गए हों। प्रकृति की छटाएं जहां मन को मोहित कर आत्मविभोर कर देती है। जगत जननी भगवती के चरणों के प्रति प्रगाढ़ होती चली जाती है। त्रेता युग में जब लक्ष्मण को शक्ति लगी तो इसी पर्वत की दिव्य औषधियों को ले जाकर हनुमान जी ने लक्ष्मण के प्राण बचाए। वनवास काल में पांडव इसी क्षेत्र में स्थित पांडुखोली नामक  अज्ञातवास में रहे थे। उनके गुरू द्रोणाचार्य ने इस पर्वत पर तपस्या की इसीलिए इसे द्रोणगिरि कहा जाने लगा।

इसी क्षेत्र में गर्ग मुनि का आश्रम था जिनकी तपस्या के प्रभाव से गगास नदी का उद्गम हुआ। शुक्रदेव एवं जामदन्य ऋषियों की तपोभूमि भी यही दुनागिरी है। इसके अलावा उत्तरांचल के प्रसिद्ध अध्यात्मक-योगियों का साधना स्िाल भी यही क्षेत्र रहा है।
अल्मोड़ा से 65 किमी और रानीखेत से 38 किमी दूर द्वाराहाट से 14 किमी की ऊंचाई पर स्थित दुनागिरी की पौराणिक कथा के अनुसार पद्यकल्प में असुरों ने इंद्रादि देवताओं को पराजित करके उनके संपूर्ण अधिकार जब स्वयं ले लिए तो ब्रह्माजी के नेतृत्व में सभी देवताओं ने हिमालय में महादेव एवं विष्णु भगवान को अपनी व्यथा सुनाई। देवताओं की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य पुंज प्रकट हुआ जिससे वैष्णवी शक्ति का जन्म हुआ। इसी वैष्णवी शक्ति ने सिंह की सवारी करके असुरों का संहार कर देवताओं की रक्षा की। दुनागिरी की गणना शक्ति के प्रधान उग्र पीठों में भी होती है। स्कंद पुराण के ‘मानस खंडे’ के द्रोणाहिमाहात्म’ के अनुसार यह देवी शिव की शक्ति है क्योंकि उसे ‘महामाया हरप्रिया’ के रूप में वर्णित किया गया है।

दुनागिरी देवी की महिमा उत्तरांचल में दूर-दूर तक फैली हुई है। उत्तराखंड के नवविवाहित जोड़े यहां माता का आशीर्वाद लेने अवश्य आते हैं। भक्तजन दुनागिरी देवी की पूजा एक सुहागिन देवी के रूप में करते हैं इसलिए चूड़ी, चरेऊ, सिंदूर आदि श्रृंगार की वस्तुएं पूजा सामाग्री में अवश्य ले जाते हैं।

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