हरतालिका तीज हिंदू धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है, जिसमें माता पार्वती और भगवान शिव की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। यह व्रत भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि को रखा जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियम-निष्ठा से यह व्रत करने से अखंड सौभाग्य, सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन में मंगल की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में हरतालिका तीज का महत्व
भविष्योत्तर पुराण में हरतालिका व्रत का विस्तृत विधान वर्णित है। इसमें माता उमा-पार्वती और भगवान महेश्वर की विधि-विधानपूर्वक पूजा करने का उल्लेख मिलता है। “हरतालिका” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — “हरत” अर्थात हरण और “आलिका” अर्थात सखी। कथा के अनुसार माता पार्वती की सखियाँ उन्हें वन में ले गई थीं, जिससे वे भगवान विष्णु से विवाह के प्रस्ताव से बच सकें और कठोर तपस्या करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त कर सकें।

पूजन विधि
हरतालिका तीज की पूजा पूर्ण श्रद्धा और नियमपूर्वक इस प्रकार की जाती है:
पूजा स्थल को स्वच्छ करके सुंदर मंडप सजाएं।
चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर उस पर शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें।
विधिपूर्वक कलश स्थापना करें।
पंचामृत से अभिषेक करने के पश्चात वस्त्र एवं श्रृंगार सामग्री माता पार्वती को अर्पित करें।
धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि अर्पित करते हुए षोडशोपचार पूजन संपन्न करें।
हरतालिका तीज की व्रत कथा का श्रवण/पाठ करें और अंत में आरती करें।

संकल्प मंत्र
पूजा प्रारंभ करने से पूर्व यह संकल्प मंत्र बोला जाता है:
मम उमामहेश्वरसायुज्यसिद्धये हरितालिकाव्रतमहं करिष्ये।
माता पार्वती की प्रार्थना
पूजन के दौरान माता पार्वती से यह प्रार्थना की जाती है:
देवि देवि उमे गौरि त्राहि मां करुणानिधे। ममापराधाः क्षन्तव्या भुक्तिमुक्तिप्रदा भव॥
व्रत के प्रमुख नियम
व्रती महिलाएं निराहार रहकर पूर्ण श्रद्धा से यह व्रत करती हैं।
सायंकाल पुनः विधि-विधान से पूजा, आरती एवं व्रत कथा का आयोजन किया जाता है।
अगले दिन शुभ समय पर पारण करके व्रत का विधिवत समापन किया जाता है।
हरतालिका तीज माता पार्वती की तपस्या, अटूट श्रद्धा और भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने की मंगलकारी कथा से जुड़ा पावन पर्व है। यह व्रत नारी शक्ति, संकल्प और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, और सुहागिन स्त्रियों के साथ-साथ कुंवारी कन्याएं भी योग्य वर की कामना से इसे धारण करती हैं।
