कुरुक्षेत्र का रणक्षेत्र अब शांत हो चुका था। अठारह दिनों तक गूंजते रहे शंखनाद, अस्त्र-शस्त्रों की टंकार और चीत्कार अब मौन में बदल चुके थे। पर एक स्थान पर अभी भी कुछ अधूरा शेष था — बाणों की शय्या पर लेटे पितामह भीष्म, जिनके प्राण अब भी शरीर में अटके हुए थे। मानो नियति ने उन्हें कुछ विशेष के लिए रोक रखा हो। कुछ ऐसा, जिसे केवल एक ही व्यक्ति सुलझा सकता था — स्वयं श्रीकृष्ण।
एक प्रश्न, जो सदियों से अनुत्तरित था
जब कृष्ण उस अंतिम संध्या में भीष्म के समीप पहुंचे, तो पितामह की आंखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। यह बेचैनी शरीर की पीड़ा की नहीं थी — यह आत्मा की उलझन थी। मृत्यु शय्या पर पड़ा हुआ मनुष्य अक्सर अपने जीवन के अनुत्तरित प्रश्नों को अंतिम बार सुलझाना चाहता है। और भीष्म के मन में एक ऐसा ही प्रश्न वर्षों से दबा हुआ था।
“एक बात बताओ प्रभु! तुम तो ईश्वर हो न?”
कृष्ण के उत्तर ने भीष्म को चौंका दिया — “नहीं पितामह, मैं ईश्वर नहीं… मैं तो आपका पौत्र हूं।”
इस एक वाक्य में जो रहस्य छिपा है, वह पूरी वार्ता की नींव बन जाता है। क्या कृष्ण सच में स्वयं को साधारण मानते थे? या यह उनकी उस लीला का हिस्सा था, जिसे समझ पाना किसी साधारण मनुष्य के वश की बात नहीं?
जो प्रश्न भीष्म को चैन नहीं लेने दे रहा था
अपनी अंतिम रात्रि में भीष्म ने वह पूछ ही लिया, जो शायद वे वर्षों से पूछना चाहते थे — “इस युद्ध में जो हुआ, वो ठीक था क्या?”
आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन की जंघा पर प्रहार, दुःशासन का वक्षस्थल चीरा जाना, जयद्रथ और द्रोणाचार्य के साथ हुआ छल, निःशस्त्र कर्ण का वध — भीष्म एक-एक कर वे सभी घटनाएं गिनाते हैं, जो धर्मयुद्ध की मर्यादाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती प्रतीत होती हैं।
और यहीं से आरंभ होता है वह रहस्यमय संवाद, जिसने युगों-युगों तक मानव सभ्यता को धर्म, नीति और समय के गूढ़ सिद्धांतों की एक नई दृष्टि दी।

कृष्ण की चुप्पी, फिर वह चौंकाने वाला उत्तर
पहले तो कृष्ण टाल गए — “इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए, जिन्होंने यह किया। मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह।”
पर भीष्म, जिन्होंने युगों को देखा था, इस छलावे में आने वाले नहीं थे। “अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है, पर मैं जानता हूं कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है।”
और तब कृष्ण ने वह कहा, जो शायद सबसे अधिक रहस्यमय और गहन उत्तर था — “कुछ बुरा नहीं हुआ, कुछ अनैतिक नहीं हुआ। वही हुआ जो होना चाहिए।”
राम और कृष्ण: एक ही ईश्वर, दो भिन्न मार्ग
भीष्म का अगला प्रश्न और भी गहरा था — “यह मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है? यह छल तो सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा।”
कृष्ण का उत्तर मानो समय के किसी गूढ़ रहस्य का पर्दा उठा देता है। वे बताते हैं कि त्रेता युग और द्वापर युग की परिस्थितियां भिन्न थीं। राम के युग में रावण जैसा खलनायक भी शिवभक्त था, उसके ही परिवार में विभीषण, मंदोदरी और माल्यवान जैसे सज्जन थे। बाली जैसे खलनायक के घर भी तारा और अंगद जैसे धर्मज्ञ थे। उस युग का अधर्म भी कहीं न कहीं धर्म की सीमाओं को जानता था।
पर द्वापर में कंस, जरासंध, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनी, जयद्रथ जैसी शक्तियां आईं — जो धर्म की किसी सीमा को नहीं मानती थीं। “उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह। पाप का अंत आवश्यक है, वह चाहे जिस विधि से हो।”

एक भविष्यवाणी, जो आज भी गूंजती है
पर सबसे रहस्यमय क्षण तब आता है, जब भीष्म पूछते हैं — क्या इन निर्णयों से गलत परंपराएं आरंभ नहीं होंगी? क्या भविष्य इसी छल का अनुसरण नहीं करेगा?
कृष्ण का उत्तर मानो आने वाले युगों की एक झलक दिखा देता है — “भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह। कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा। वहां मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा — नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा।”
यह वाक्य आज, हजारों वर्ष बाद भी, उतना ही रहस्यमय और गहन प्रतीत होता है। क्या यह केवल महाभारत काल की बात थी, या कृष्ण वास्तव में उस युग का संकेत दे रहे थे, जिसमें आज हम जी रहे हैं?

अंतिम रहस्य: ईश्वर कुछ नहीं करता
संवाद के अंत में कृष्ण एक ऐसा रहस्य खोलते हैं, जो शायद सम्पूर्ण गीता के सार को भी समाहित कर लेता है — “ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता। केवल मार्गदर्शन करता है। सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है।”
वे भीष्म से ही पूछते हैं — “बताइए न पितामह, मैंने स्वयं इस युद्ध में कुछ किया क्या? सब पांडवों को ही करना पड़ा न? यही प्रकृति का संविधान है।”
विदा की वेला
इतना सुनकर भीष्म को मानो संतोष मिल गया। उनकी आंखें धीरे-धीरे मूंदने लगीं। “चलो कृष्ण! यह इस धरा पर मेरी अंतिम रात्रि है। कल संभवतः चले जाना हो। अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना।”
