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भगवत्प्राप्ति के गूढ़ रहस्य जाने बिना नहीं मिलेगी सिद्धि : ज्योतिषाचार्य आदित्य झा

तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। आध भूते च किं प्रोक्तमधिदैवं कि मुच्यते।। अर्थात ब्रह्म क्या है? आत्मा क्या है, सकाम कर्म क्या है, यह भौतिक जगत क्या है, देवता क्या हैं? आदि प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से प्रार्थना करते हंै। ध्यातव्य है कि अर्जुन ने परमेश्वर को पुरूषोत्तम या परम पुरूष कहकर संबोधित किया है जिसका अर्थ यह होता है वे ये सारे प्रश्न अपने एक मित्र से नहीं अपितु परम पुरुष से उन्हें परम प्रमाण मानकर, पूछ रहे थे, जो निश्चित उत्तर दे सकते थे। अधियज्ञ: कथं नियतात्मभि: एक अन्य श्लोक में भगवान को अधियज्ञ व मधुसूदन कहकर संबोधित किया है। अधियज्ञ का अर्थ विष्णु या इंद्र हो सकता है। विष्णु सभी देवताओं में जिनमें ब्रह्मा तथा शिव सम्मिलित हैं, प्रधान देवता हैं और इंद्र प्रशासक देवताओं में प्रधान हैं।

भगवान कहते हैं कि मेरा (कृष्ण) नाम स्मरण करते-करते प्राणों का त्याग करने वाला मुझमें ही (कृष्ण) समाहित हो जाता है। इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है। मद्भाव अर्थात दिव्य स्वभाव की प्राप्ति। स्मरण शब्द से ही कृष्ण भावनामृत का सोपान होता है अर्थात स्मरण उस अशुद्ध जीव से नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त भगवन उपदेश देते हुये कहते हैं कि अंत समय में मनुष्य जिस-जिस भाव का स्मरण करेगा वह उस भाव को निश्चत ही प्राप्त करेगा। यही विधि का विधान है। यहां श्रीकृष्ण जी ने कहा है कि यह आवश्यक नहीं कि मुझे स्मरण करने वाला मुझको ही प्राप्त न हो, अपितु उसकी भावना भी मुझमें यदि होगी तो वह इस जीवन रूपी बंधन से हमेशा-हमेशा मुक्त हो जायेगा। इस प्रकार आपका अगला जीवन भी सिद्ध हो जायेगा। इसके अतिरिक्त भगवान कहते हैं कि जो मनुष्य अपने प्राण को योग शक्ति से भौहों के मध्य स्थिर कर लेता हुआ परमेश्वर स्मरण में लगाता है वह भी निश्चित रूपेण मुझे प्राप्त कर लेता है अर्थात योग का जीवन में बहुत महत्व है।

योग का अध्यात्म से नीर-क्षीर संबंध है क्योंकि मन को विचलित होने से रोकने के लिए योग अत्यावश्यक है तथा अध्यात्म परम सिद्धि के लिए अत्यावश्यक है। यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागा:।। यदिच्छन्नो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्यै।। वेदों को जानने वाले, ओंकार का उच्चारण करने वाले जो विलक्षण संन्यासी हैं वे ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। ऐसी सिद्धि की इच्छा करने वाले ब्रह्मचर्य व्रत का अभ्यास करते हैं। अब मैं तुम्हें वह विधि बताऊंगा जिससे कोई भी व्यक्तिगत मुक्ति-लाभ कर सकता है। समस्त ऐन्द्रिय क्रियाओं से विरक्ति को योग की स्थिति (योग धारणा) कहा जाता है। इन्द्रियों के समस्त द्वारों को बंद करके तथा मन को हृदय में और प्राणवायु को सिर पर केन्द्रित करके मनुष्य अपने को योग में स्थापित करता है। गीता समस्त योग पद्धतियों में से भक्ति योग की ही संस्तुति करता है।

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