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अध्यात्म का रहस्य: मंत्र की शक्ति

भारतीय वांङ्गमय अध्यात्म, मंत्र, तंत्र और यंत्र साहित्य से परिपूर्ण है। अध्यात्म भारतीय ऋषियों का मौलिक चिंतन है। उन्होंने स्वयं मंत्र का साक्षात्कार किया और तब ही उसे लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया। मंत्र ध्वनि तरंगों का एकत्रित स्वरूप है। दूसरे शब्दों में नियोजित ध्वनि तरंगों की अभिव्यक्ति ही मंत्र है। मंत्र तीर्थ, द्विजे देवेषे भेषजे गुरो। यादृशी भावना यस्य सिद्धीर्भवति तादृशी।। अर्थात मंत्र, तीर्थ, द्विज, देव, ज्योतिषी, औषधि और गुरु में जैसी भावना हो वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। मंत्र अध्यात्म का प्रथम द्वार है।
ब्रह्म के बाद से प्रणव की उत्पत्ति हुई प्रणव बीज ऊँ कार से वेद प्रकट हुए, वेद कि शाखाएं विस्तृत होती गयीं व उन्हें स्मृतियों में संग्रहीत किया गया। ऋषियों ने केवल मंत्रों पर चिंतन किया व पारंपरिक रूप से गुरु शिष्य प्रणाली से मंत्रों का प्रचार-प्रसार हुआ। निगम को स्मृतियों ने अपने भीतर संग्रहीत किया व आगमशास्त्र केवल ऋषियों द्वारा फैलता गया। कलियुग के आगमन के पूर्व परमात्मा शिव ने सभी मंत्रों को कीलित कर दिया व उनके फल को बाधित कर दिया ताकि कोई मनुष्य स्वार्थवश उनकी शक्ति का दूरुपयोग न कर पाए व उन मंत्रों को जागृत करने के उपाय तंत्र शास्त्र के माध्यम से सीमित रखे। अध्यात्म न तो किसी ग्रंथ में पाया जाता है और न ही किसी मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे में बंटता है। अध्यात्म दिव्य अलौकिक अनुभूती है।

जब आत्मा रुपी हंस उस परमतत्व की खोज में लीन रहता है तब उसे उस दिव्य चेतना का साक्षात्कार होता है और वही परमहंस की स्थिति हांसिल कर लेता है। ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या अर्थात ब्रह्म एक है और हम सब उसकी माया रूपी सृष्टि है। ब्रह्म द्वैत, अद्वैतवाद से भी परे है। ऊँ स्वयं परमात्मा के हस्ताक्षर हैंै। धर्म केवल सनातन धर्म ही है, हिंदु, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई यह सब संप्रदाय हैं। धर्म में बाह्य आडंबर का कोई स्थान नहीं है। जो आडंबर करता है वह सत्य से कोसों दूर चला जाता है। सत्य ही धर्म का मूल तत्व है। भक्ति में कोई युक्ति नहीं चलती। भगवत प्रीति का ही नाम भक्ति है। अध्यात्म भारतीय ऋषियों का मौलिक चिंतन है। उन्होंने स्वयं मंत्र का साक्षात्कार किया और तब ही उसे लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया। मंत्र ध्वनि तरंगों का एकत्रित स्वरूप है।
दूसरे शब्दों में नियोजित ध्वनि तरंगों की अभिव्यक्ति ही मंत्र है। एकाग्रता, एकरसता, एकलयता से समुच्चारित तरंगों से उत्पन्न ऊर्जा से विशेष शक्ति जागृत हो जाती है, उस शक्ति का व्यक्ति अपनी लक्ष्य शक्ति के अनुरूप उपयोग कर सकता है। जैसे भारत की स्वतंत्रता के उपलक्ष हेतु आजाद हिंद फौज को संबोधित करते समय नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था कि तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, यह वाक्य उस समय युवाओं के मन-मस्तिष्क पर पूरा असर कर गया था। सैकड़ों माता-पिताओं ने अपने वीर सपूतों को देश पर बलिदान होने के लिए अनुमति दे दी थी। यह वाक्य एक मंत्र के रूप में काम कर गया था।


मंत्र में ऐसी रहस्य शक्ति व्याप्त है, जो वाणी द्वारा प्रकाशित नहीं की जा सकती है, अपितु मंत्र शक्ति द्वारा वाणी स्वयं प्रकाशित होती है। मंत्र आप्तवाक्यजन्य होते हुए भी मंत्र की शक्ति अवर्णनीय है। मंत्र के शक्ति व स्वरूप की व्याख्या करने पर यह कहा जा सकता है कि मंत्र सर्व शक्तियों से संपन्न, नाश रहित, नित्य सर्व व्यापक जहां वाणी नहीं जा सकती वहां मंत्र जाता है। अग्नि पुराण के अनुसार मंत्र भोग एवं मोक्ष दोनों को प्रदान करता है। बीस अक्षरों से अधिक अक्षर वाले मंत्र महामंत्र कहलाते हैं और दस अक्षर से कम वाले मंत्र को बीज मंत्र की संज्ञा दी जाती है। पांच अक्षरों से अधिक और दस से कम अक्षरों वाले मंत्र सर्वथा सिद्धि प्रदान करने वाले होते हैं। मंत्रों की तीन जातियां होती हैं- स्त्री, पुरुष और नपुंसक। जिन मंत्रों के अंत में स्वाहा शब्द लगता है वे स्त्री जाति के होते हैं, जिन मंत्रों के अंत में नम: शब्द लगता है वे सब नपुंसक मंत्र कहलाते हैं और शेष सभी पुरुष जाति के होते हैं।

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