भारतीय दर्शन के चार आधारभूत स्तंभ — कर्म-सिद्धांत, पुनर्जन्म, मोक्ष और अध्यात्मवाद — ऐसे सिद्धांत हैं जिन्हें चार्वाक को छोड़कर सभी दर्शन प्रणालियाँ स्वीकार करती हैं। आस्तिक (सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदांत) हों या नास्तिक (जैन, बौद्ध), सभी इस बात पर सहमत हैं कि मनुष्य अपने कर्मों का फल अवश्य भोगता है — चाहे इस जन्म में या अगले में।
कर्म-सिद्धांत केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि एक नैतिक और वैज्ञानिक नियम है — जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है।
वैदिक काल में कर्मवाद का उद्भव
कर्म-सिद्धांत का बीज वैदिक दर्शन में निहित है। वैदिक ऋषियों ने ब्रह्माण्ड की नैतिक और दैवी व्यवस्था को ऋ कहा — जो सत्य, नियम, संतुलन और न्याय का शाश्वत सिद्धांत है। ऋत् न केवल प्राकृतिक जगत का संचालन करता है बल्कि मनुष्य के आचरण को भी दिशा देता है।
उपनिषद काल तक आते-आते यही कर्मवाद के रूप में विकसित हुआ —जैसा हम बोते हैं वैसा ही काटते हैं।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।
न भुक्तं क्षीयते कर्म जन्म कोटि शतैरपि॥
— ब्रह्मवैवर्त पुराण

अर्थात् मनुष्य द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है; बिना भोगे वह करोड़ों जन्मों में भी क्षीण नहीं होता।
दार्शनिक दृष्टि से कर्म का स्वरूप
न्याय-वैशेषिक दर्शन में कर्म को अदृष्ट कहा गया है — जो दिखता नहीं, पर हर जीव और वस्तु पर प्रभाव डालता है।
मीमांसा दर्शन ने कर्मों को पाँच प्रकारों में बाँटा —
नित्य कर्म- प्रतिदिन के कर्तव्य जैसे पूजा, संध्या, ध्यान।
नैमित्तिक कर्म झ्- विशेष अवसरों पर किए जाने वाले कर्म।
काम्य कर्म झ्ल- प्राप्ति की इच्छा से किए गए कर्म।
निषिद्ध कर्म – वे कर्म जो वेदों में निषिद्ध बताए गए हैं।
प्रायश्चित्त कर्म – अशुभ कर्मों के प्रायश्चित्त के लिए।
भगवद्गीता में निष्काम कर्मयोग
भगवद्गीता कर्म-सिद्धांत को उच्चतम दार्शनिक ऊँचाई पर ले जाती है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं —
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।
यह निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत है — कर्म करो, लेकिन फल की आसक्ति मत रखो। यही दृष्टि व्यक्ति को बंधन से मुक्त कर मोक्ष के मार्ग पर ले जाती है। निष्काम कर्मयोगी सुख-दुख, हानि-लाभ, जय-पराजय से ऊपर उठकर केवल अपने कर्तव्य पालन में समर्पित रहता है।
भाग्य और कर्म : कारण-कार्य का संबंध
कर्म-सिद्धांत भाग्यवाद का खंडन करता है। यह कहता है कि भाग्य कोई ईश्वरीय वरदान या श्राप नहीं, बल्कि पूर्व जन्मों के कर्मों का परिणाम है।
वर्तमान जीवन की परिस्थितियाँ हमारे पिछले कर्मों का फल हैं, परंतु भविष्य हमारे वर्तमान कर्मों से निर्धारित होता है।
इस प्रकार मनुष्य अपने भविष्य का निमार्ता स्वयं है।
कर्म प्रधान विश्व करि राखा,
जो जस करइ सो तस फल चाखा।ह्
— गोस्वामी तुलसीदास

वेदांत और भक्ति में कर्म का स्थान
रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत में कर्म, ज्ञान और भक्ति — तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना कर्म से चित्तशुद्धि संभव नहीं और बिना चित्तशुद्धि के भक्ति का उदय नहीं।
मध्वाचार्य ने कर्म को दस पदार्थों में एक माना — विहित, निषिद्ध, उदासीन तीन प्रकार में विभाजित किया।
वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैत में भगवत्-प्राप्ति के तीन मार्ग बताए गए — कर्ममार्ग, ज्ञानमार्ग और पुष्टिमार्ग। इनमें कर्ममार्ग को भी पर्याप्त महत्व दिया गया है।
कर्म-सिद्धांत का सामाजिक और नैतिक प्रभाव
कर्म-सिद्धांत व्यक्ति में उत्तरदायित्व, नैतिकता और आत्मबल का भाव जगाता है।
यह व्यक्ति को यह समझाता है कि —
मेरे सुख-दुख, हानि-लाभ या सफलता-विफलता के लिए कोई और नहीं,
बल्कि मैं स्वयं उत्तरदायी हूँ।
