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तीर्थस्थल की हिन्दू वंशावलियों की पंजिका

हिंदू तीर्थस्थल धार्मिक मान्यताओं और पूजन अर्चन के लिए विख्यात है। इन सब कार्य को इन स्थलों के ब्राह्मण पंडित कराते हैं। ये ब्राह्मण पंडित पंडा कहे जाते हैं। ये पंडा सदियों से एक कार्य करते और कराते आ रहे हैं। ये पंडा अपने पास आने वाले यजमान (भक्तों) के परिवार का इतिहास अपनी बहियों में संजोते जा रहें हैं। ये काम सदियों से अनवरत रूप से जारी है। ये हिन्दू वंशावलियों की पंजिकाएं ऐतिहासिक धरोहर हैं। आज इनके संरक्षण की आवश्यक्ता है। इनके संजोकर रखने की जरूरत है।


हिंदू परिवारों को इस बारे में बहुत कम या न के बराबर जानकारी है। उन्हें पता भी नही कि इन स्थानों पर उनके परिवार का इतिहास संग्रहित है। सदियों से बहियों में ये रिकार्ड व्यापारी के खाते की तरह लिखकर रखा जा रहा है। अधिकतर भारतीयों व वे परिवार जो विदेश में बस गए उनको आज भी पता नहीं कि इन तीर्थस्थल की पंडो की बहियों में उनके परिवार की वंशावली दर्ज है। हिन्दू परिवारों की पिछली कई पीढ़ियों की विस्तृत वंशावलियां इन पंडा के पास संग्रहित हैं। ये पंडा आने वाले यजमान से उसके परिवार की जानकारी नोट करने के बाद उसके हस्ताक्षर कराकर बही में अपने पास रखते हैं। ये पंडा ये बहियां अपनी आने वाली अपनी पीढ़ी को सौंपते जाते हैं। ये बहियां जिलों व गांवों के आधार पर वगीर्कृत की गयीं हैं। प्रत्येक जिले की पंजिका का विशिष्ट पंडित होता है। यहाँ तक कि भारत के विभाजन के उपरांत जो जिले व गाँव पाकिस्तान में रह गए व हिन्दू भारत आ गए उनकी भी वंशावलियां यहाँ हैं। कई स्थितियों में उन हिन्दुओं के वंशज अब सिख हैं, तो कई के मुस्लिम अपितु ईसाई भी हैं। किसी−किसी की सात वंश या उससे भी ज्यादा की जानकारी पंडों के पास रखी इन वंशावली पंजिकाओं से होना साधारण सी बात है


इन तीर्थ स्थल के पुरोहितों के पास देश और दुनिया भर के यजमानों का दशकों पुराना लिखित रिकॉर्ड वंशावली के रूप में मौजूद है। किसी यजमान के आने पर चंद मिनटों में ही संबंधित पुरोहित कंप्यूटर से भी तेज गति से वंशावली देखकर उनके पूर्वजों की जानकारी दे देते हैं। पितृ पक्ष के दौरान इन तीर्थ स्थल पर आने वाले लोग अपने तीर्थ पुरोहितों के पास आकर वंशावली में अपने वंश के बारे में जरूर जानते हैं। ये पडे जनपद के हिसाब से हैं। तीर्थ स्थल में पहने वालों को पता है कि किस जनपद के पंडा कौन हैं। किसी दूसरे के यजमान को कोई अन्य पंडा खुद क्रिया−कर्म नहीं कराता। संबधित जिले के पंडा के पास उसे भेज देता है। फैमिली वेकेशन पैकेज शताब्दियों से हो रहा ये लेखन भोज पत्रों और ताम्र पत्रों के बाद अब कागज की बहियों पर शुरू किया गया।

तीर्थ पुरोहितों के पास सैकड़ों वर्ष पुरानी बहियां आज भी सुरक्षित हैं। तीर्थ पुरोहितों की बहियों में देश भर के राजाओं, महाराजाओं, साधु, संतों, राजनेताओं एवं आम लोगों के परिवारों के वंश लेखन बहियों में मौजूद हैं। अकेले हरिद्वार में 30 हजार से अधिक की संख्या में वंशावली की बहियां सुरक्षित और संरक्षित हैं। इन बहियों में लेखन करने के लिए अलग स्याही तैयार करके तीर्थ पुरोहित वही लेखन करते हैं, जो काफी वर्षों तक सुरक्षित रहती है। इन वंशावलियों में जातियों, गोत्रों, उपगोत्रों का भी जिक्र रहता है।

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