इस साल करवा चौथ गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को है। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी पर महिलाएं पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से व्रत रखती हैं। शाम की पूजा और चंद्रमा को अर्घ्य के साथ सोलह श्रृंगार भी इस पर्व की खास पहचान है।
शादी की चुनरी से मां की दी चूड़ियों तक
करवा चौथ पर गहनों के डिब्बे खुलते हैं, तो उनके साथ यादें भी निकल आती हैं। शादी में पहना हार, मां की दी हुई चूड़ियां या सास से मिली पायल, इनकी अहमियत कीमत से कहीं ज़्यादा होती है। इसी लगाव के कारण कई महिलाएं इस दिन अपना शादी का जोड़ा दोबारा पहनना पसंद करती हैं।
सिंदूर, चूड़ियां, मंगलसूत्र और बिछिया को अलग-अलग समुदायों में सौभाग्य और विवाहित जीवन का प्रतीक माना जाता है। करवा चौथ पर इन्हें पहनने की परंपरा इसी भावना से जुड़ी है। हालांकि हर परिवार की रीति एक जैसी नहीं होती। कहीं मंगलसूत्र पहना जाता है, तो कहीं गले के दूसरे पारंपरिक आभूषणों को महत्व मिलता है।

श्रृंगार का शुक्र ग्रह से क्या संबंध है?
ज्योतिष में शुक्र को सौंदर्य, आकर्षण, वस्त्र, आभूषण, सुगंध और दांपत्य सुख का कारक माना जाता है। इसी कारण सजने-संवरने की परंपरा को शुक्र से जोड़कर समझाया जाता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गहने पहनते ही कुंडली का शुक्र मज़बूत हो जाएगा। किसी ग्रह का फल उसकी राशि, भाव, दृष्टि, बल और दशा जैसी स्थितियों से देखा जाता है। इसलिए करवा चौथ के श्रृंगार को वैवाहिक परेशानियां दूर करने का पक्का उपाय बताना सही नहीं है। इसी तरह हर आभूषण को अलग ग्रह से जोड़कर यह दावा करना कि उसे पहनने से कोई दोष मिट जाएगा, बिना स्पष्ट शास्त्रीय संदर्भ के स्वीकार नहीं करना चाहिए।

चंद्रमा की सोलह कलाओं की मान्यता
शाम की पूजा के बाद पूरा इंतज़ार चांद पर आकर टिक जाता है। अर्घ्य के लिए जल रखा जाता है, थाली तैयार होती है और बार-बार नज़र आसमान की ओर जाती है।
सोलह श्रृंगार को चंद्रमा की सोलह कलाओं से जोड़ने वाली व्याख्या भी प्रचलित है। पारंपरिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन और भावनाओं का कारक माना जाता है। फिर भी सोलह कलाओं और सोलह श्रृंगार के इस संबंध को लोकमान्यता के रूप में ही समझना चाहिए। इससे हर श्रृंगार के लिए अलग ज्योतिषीय उपाय तय नहीं हो जाता।
