आज के युग में धार्मिकता और आस्तिकता का दिखावा हर ओर देखने को मिलता है। मंदिरों और तीर्थों में भक्तों की भीड़, दान देने वालों की कतारें — देखकर लगता है मानो संसार में पुण्यात्माओं की कमी ही नहीं है। परंतु जब किसी सच्चे धर्मज्ञाता या पुण्यात्मा से इसकी वास्तविकता पूछी जाए, तो चित्र कुछ और ही सामने आता है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे चुनावों के समय नेताओं की घोषणाएं सुनकर लगता है कि उनसे बड़ा दानी और उदार कोई नहीं। परंतु उनकी असली पहचान तब होती है जब उनके कार्यकाल की समाप्ति पर उनकी संपत्ति का हिसाब सामने आता है — जनता को कितना दिया, और स्वयं के लिए कितना संचित कर लिया। आज की तथाकथित धार्मिकता भी कुछ इसी तरह की है — बाहर से आस्तिकता का आवरण, पर भीतर पुण्य और सद्गुणों का अभाव।
इसी संदर्भ में रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड के 125वें दोहे में श्रीराम जी, महर्षि वाल्मीकि से पुण्य के वास्तविक प्रभाव और फल का वर्णन करते हैं।
तात बचन पुनि मातु हित, भाइ भरत अस राउ। मो कहुं दरस तुम्हार प्रभु, सबु मम पुण्य प्रभाउ।।
श्रीराम जी वाल्मीकि जी से कहते हैं कि पिता, माता और भाई का जो सुसंयोग उन्हें प्राप्त हुआ है, वह सब उनके पूर्वजन्म के पुण्यों का ही फल है। आइए, इस दोहे में छिपे पुण्य के चार प्रभावों को क्रमशः समझें।

पुण्य का प्रथम प्रभाव — पिता के वचनों का पालन
“तात बचन” के माध्यम से श्रीराम जी बताते हैं कि उनके पुण्य का पहला प्रभाव यह है कि उन्हें पिता महाराज दशरथ के चौदह वर्ष के वनवास संबंधी वचन का पालन करने का सामर्थ्य प्राप्त हुआ। सामान्यतः किसी के वचनों का पालन करने में शारीरिक कष्ट होने पर श्रद्धा क्षीण होने लगती है, परंतु श्रीराम के मन में पिता के प्रति किंचित भी क्षोभ या अश्रद्धा उत्पन्न नहीं हुई। इसके विपरीत, उन्हें इस अवसर पर अत्यंत प्रसन्नता हुई।
श्रीराम स्पष्ट करते हैं कि महाराज दशरथ उन्हें एक क्षण भी दुखी नहीं देख सकते थे, फिर भी पुण्य के प्रभाव से यह ऐसा अवसर बना कि संसार को धर्मपालन और आज्ञापालन का आदर्श दर्शन प्राप्त हुआ। गुरु और माता-पिता सदैव हितकारी होते हैं, और उनकी आज्ञा का पालन करने से बिना धन के ही यश और पुण्यलोक की प्राप्ति होती है।

पुण्य का द्वितीय प्रभाव — माता का हित
“पुनि मातु हित” के अंतर्गत श्रीराम बताते हैं कि पिता के वचन-पालन के साथ-साथ उन्हें माता कैकेयी और माता कौशल्या, दोनों का हित करने का अवसर भी प्राप्त हुआ।
जब माता कैकेयी ने चौदह वर्ष का वनवास मांगा था, तब समस्त जनता उन्हें धिक्कारने लगी थी। परंतु श्रीराम द्वारा सहर्ष वनवास स्वीकार कर लेने पर, जनता ने उनके मातृप्रेम को देखकर कैकेयी के विरुद्ध दुर्वचन बोलना बंद कर दिया। इस प्रकार श्रीराम की प्रियता के कारण माता कैकेयी का अहित नहीं हुआ।
वहीं माता कौशल्या को भी पुत्र के वनवास से ही यश की प्राप्ति हुई, क्योंकि यशस्वी और धर्मात्मा संतान से ही माता-पिता को सहज यश मिलता है। श्रीराम कहते हैं कि उनकी माता को कभी उनकी निंदा सुनने का अवसर नहीं आया — जहां भी वे जाएंगे, माता कौशल्या को आदर ही प्राप्त होगा। इसके विपरीत, अधर्मी और असत्यवादी संतान से माता-पिता को केवल अपयश ही सुनने को मिलता है, जो सबसे बड़ा दुख है।

पुण्य का तृतीय प्रभाव — भरत जैसा भ्राता
“भाइ भरत अस राउ” के माध्यम से श्रीराम अपने पुण्य का तीसरा प्रभाव बताते हैं — भरत जैसे भाई की प्राप्ति। भरत जैसा राजा अयोध्या को मिलना यह सुनिश्चित करता है कि जनता, परिवार, धर्म और प्रेम — सभी का समुचित निर्वहन होगा। भरत धर्म और मर्यादा के साथ प्रजा का भरण-पोषण भी पिता के समान ही करेंगे।
श्रीराम कहते हैं कि परिवार के सदस्यों में विचारों की भिन्नता स्वाभाविक है, परंतु विरुद्ध विचारों को भी अनुकूल बनाते हुए परिवार और समाज की रक्षा तथा उन्नति करना — यह भी पुण्य का ही फल है।
यह संसार एक विस्तृत परिवार के समान है, और इसके सभी सदस्य अपने-अपने पूर्वजन्म के कर्मों के अनुसार ही एक-दूसरे के यहां जन्म लेते हैं। जिसके जैसे पाप-पुण्य होते हैं, उसे वैसा ही यश, अपयश, हानि, लाभ, संयोग और वियोग इस संसार में भोगना पड़ता है — यही कर्म की प्रबलता है।
पूर्वजन्म के कुछ दुष्कर्मों के कारण दुख तो सभी को प्राप्त होता है, परंतु यदि दुख हरने वाले संत और दुख में साथ देने वाले पत्नी, पुत्र, भ्राता जैसे स्वजन प्राप्त हो जाएं, तो यह भी पुण्य का ही फल माना जाता है।
