आज का युग आधुनिकता और तकनीक का है, लेकिन यदि आधुनिकता के साथ संस्कार न हों, तो वही प्रगति परिवार और समाज के लिए संकट बन सकती है। माता-पिता अपने बच्चों को हर सुविधा देना चाहते हैं, परंतु केवल सुविधाएँ ही उज्ज्वल भविष्य की गारंटी नहीं होतीं। अच्छे संस्कार, नैतिक शिक्षा और सही मार्गदर्शन ही बच्चे के व्यक्तित्व की वास्तविक नींव रखते हैं।
संयुक्त परिवारों में बच्चे दादा-दादी और बड़ों से सम्मान, त्याग, अनुशासन और पारिवारिक मूल्यों की शिक्षा सहज रूप से सीखते थे। आज एकल परिवारों में यह अवसर कम होता जा रहा है। व्यस्त जीवनशैली के कारण माता-पिता के पास भी बच्चों के साथ समय बिताने का अभाव है, जिसका प्रभाव उनके व्यवहार और सोच पर दिखाई देता है।

मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ज्ञान के साथ-साथ कई प्रकार के दुष्प्रभाव भी लेकर आए हैं। यदि बच्चों को सही दिशा न मिले, तो वे आसानी से गलत संगति, नशे और भौतिक आकर्षण की ओर बढ़ सकते हैं। इसलिए केवल आधुनिक सुविधाएँ देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके उपयोग की सही समझ देना भी आवश्यक है।
शास्त्रों में कहा गया है कि अनैतिक तरीके से अर्जित धन परिवार में अशांति का कारण बनता है। बच्चों के सामने माता-पिता और शिक्षक जैसा आचरण करेंगे, वैसा ही संस्कार उनमें विकसित होगा। इसलिए ईमानदारी, सादगी, अनुशासन और आध्यात्मिक मूल्यों का पालन सबसे पहले बड़ों को स्वयं करना चाहिए।

क्या करें?
- बच्चों के साथ प्रतिदिन समय बिताएँ।
- उन्हें भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और योग-ध्यान से जोड़ें।
- मोबाइल और इंटरनेट के उपयोग पर संतुलित निगरानी रखें।
- जेब खर्च सीमित रखें और मित्रों की जानकारी रखें।
- स्वयं आदर्श बनें, क्योंकि बच्चे उपदेश से अधिक व्यवहार से सीखते हैं।
आधुनिकता जीवन को सुविधाजनक बनाती है, लेकिन संस्कार ही जीवन को सफल और सुखी बनाते हैं। जब परिवार में प्रेम, अनुशासन, नैतिकता और आध्यात्मिक मूल्यों का वातावरण होगा, तभी आधुनिकता भी समाज और राष्ट्र के लिए वरदान सिद्ध होगी।
