बहुत से लोग मन की शांति, सुख और ईश्वर की कृपा पाने के लिए नियमित पूजा-पाठ करते हैं, फिर भी उनके जीवन में दुख और अशांति बनी रहती है। इसका कारण पूजा नहीं, बल्कि पूजा के पीछे छिपी अपेक्षाएँ हैं।
अधिकांश लोग किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए भगवान की आराधना करते हैं। जब मनोकामनाएँ पूरी नहीं होतीं, तो भक्ति भी निराशा का कारण बन जाती है। जबकि सच्ची भक्ति का आधार प्रेम, विश्वास और समर्पण है, न कि केवल इच्छाओं की पूर्ति।

संतों का कहना है कि ईश्वर को मंत्रों से अधिक निर्मल हृदय प्रिय है। यदि मन में अहंकार, लोभ और द्वेष बना रहे, तो केवल पूजा-पाठ से आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। भक्ति तभी सार्थक होती है, जब वह हमारे विचारों, व्यवहार और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाए।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण का संदेश है कि निष्काम भाव से किया गया कर्म और समर्पित भक्ति ही ईश्वर तक पहुँचती है। वहीं शिवपुराण भी बताता है कि पूजा के साथ आचरण की पवित्रता आवश्यक है।
सच्ची भक्ति का अर्थ केवल अधिक पूजा करना नहीं, बल्कि अपने भीतर प्रेम, करुणा, संतोष और समर्पण का विकास करना है। जब पूजा माँगने का माध्यम नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति प्रेम और विश्वास का प्रतीक बन जाती है, तभी मन को वास्तविक शांति और आत्मा को परम आनंद की अनुभूति होती है।
