भारत का जीवन सदा से धर्मप्रधान रहा है। लेकिन यहाँ धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति, मत या संप्रदाय नहीं है। यह जीवन का शाश्वत नियम, समाज की रीढ़ और राष्ट्र की आत्मा है। धर्म वह शक्ति है जो व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र को संतुलित रखती है, और जिसे हम धारण करते हैं।
यहाँ तक कि ईश्वर भी धर्म का पालन करते हैं। कभी श्रीराम बनकर, कभी कृष्ण या बुद्ध बनकर, वे धर्म का आचरण करके लोगों को प्रेरित करते हैं। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

यह श्लोक बताता है कि धर्म पूजा या आस्था से ऊपर है। वह जीवन और सृष्टि के नियमों से जुड़ा है। साथ ही, धर्म की शक्ति संख्या या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और नैतिक मूल्यों से मापी जाती है। इसलिए वह अल्पमत में भी श्रेष्ठ है।
स्वधर्म से राष्ट्रधर्म और विश्वधर्म तक
धर्म की यात्रा व्यक्ति से शुरू होती है:
स्वधर्म: परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति व्यक्ति के कर्तव्य
राष्ट्रधर्म: समाज को जोड़ने वाली नीति और मर्यादा, जो राष्ट्र को प्राण देती है
विश्वधर्म: वह दृष्टि जो पूरी मानवता के संतुलन की दिशा तय करती है
श्रीराम का वनवास इसका जीवंत उदाहरण है। उन्होंने राजसुख त्यागा, पिता की आज्ञा मानी और धर्म की रक्षा के लिए कठिन निर्णय लिए। वही स्वधर्म आगे चलकर राष्ट्रधर्म बना।

पश्चिमी सेकुलरिज्म और भारत
इस लेख का केंद्रीय तर्क यह है कि पश्चिमी सेकुलरिज्म का अंधानुकरण भारत के लिए उचित नहीं है।
पश्चिम में इसका जन्म मध्ययुगीन यूरोप में चर्च और राज्य के अत्याचारों के विरोध में हुआ। वहाँ धर्म सत्ता का साधन बन चुका था, इसलिए दोनों को अलग करना आवश्यक था। भारत में स्थिति भिन्न है। यहाँ धर्म सत्ता का नहीं, जीवन और नीति का आधार है, और धर्म और राज्य एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। राजा का कर्तव्य था धर्म के अनुसार शासन करना।
