महालया एक संस्कृत शब्द है, जो ‘महा’ + ‘आलय’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है — महान आवास। यह पर्व मुख्यतः उत्तर भारत और विशेष रूप से बंगाल में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पितृ पक्ष की समाप्ति के अगले दिन आने वाली अमावस्या को पड़ता है, और इसी दिन से दुर्गा पूजा तथा नवरात्रि के आरंभ की नींव मानी जाती है। महालया के अगले ही दिन नवदुर्गा के प्रथम स्वरूप माता शैलपुत्री की पूजा प्रारंभ होती है।
माँ दुर्गा का पृथ्वी पर आगमन
मान्यता है कि इसी दिन माँ दुर्गा कैलाश पर्वत छोड़कर 10 दिनों के लिए पृथ्वी पर अवतरित होती हैं और समस्त बुरी शक्तियों से, विशेषकर बच्चों की, रक्षा करती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जब पृथ्वी महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त हो चुकी थी, तब उसके संहार के लिए इसी दिन माँ दुर्गा का प्राकट्य हुआ था।
पितरों की विदाई और देवी का स्वागत
महालया का दिन मुख्यतः दो भागों में विभाजित होता है:

पहला भाग — पितृ विदाई: दोपहर तक लोग पूजा-अनुष्ठान द्वारा पितरों को भोग अर्पित करते हैं। इस भोग के पांच भाग किए जाते हैं — देवताओं, गाय, कौवे, श्वान (कुत्ते) और चींटियों के लिए। अंत में पितरों को जल अर्पित कर उन्हें विनम्रतापूर्वक अपने लोक लौटने की प्रार्थना की जाती है।
दूसरा भाग — देवी आगमन: संध्या से स्नानादि के बाद नए वस्त्र धारण कर माँ दुर्गा के स्वागत की तैयारी होती है। मान्यता है कि संध्या पूजा के बाद भक्तों के आह्वान पर माँ दुर्गा भगवान शंकर से आज्ञा लेकर अगले 10 दिनों के लिए पृथ्वी पर आती हैं।
दुर्गा प्रतिमा के नेत्रों का निर्माण
माँ दुर्गा की प्रतिमा में उनकी जीवंत आँखों का विशेष महत्व होता है। महालया के दिन ही मूर्तिकार माता की प्रतिमा में नेत्रों का निर्माण करते हैं — परंपरागत रूप से पहले तीसरा नेत्र, फिर शेष दो नेत्र बनाए जाते हैं। इसी के साथ प्रतिमा को पूर्ण स्वरूप मिलता है और वह पूजा पंडालों की शोभा बढ़ाने के योग्य हो जाती है।
मायके आगमन की परंपरा
बंगाल में महालया को एक स्त्री के ससुराल से अपने पीहर लौटने के रूप में भी देखा जाता है। इसी भावना के अनुरूप, विवाहित स्त्रियां इस दिन अपने मायके जाती हैं, जहां उन्हें माँ दुर्गा के स्वरूप में सम्मान दिया जाता है।
