ज्योतिषाचार्य रति शुक्ला
पितृ दोष क्या है
‘पितृ’ का अर्थ है पूर्वज या दिवंगत प्रियजन, और ‘दोष’ का अर्थ है किसी प्रकार की कमी या श्राप। इन दोनों शब्दों को मिलाकर पितृ दोष उस स्थिति को कहते हैं, जिसका संबंध पूर्वजों से जुड़े किसी दोष से होता है। सामान्यतः इसे पितरों के श्राप के रूप में समझा जाता है, परंतु वास्तविकता यह है कि यह पितरों द्वारा स्वयं अपने बुरे कर्मों के कारण भोगा गया श्राप है, जिसका एक अंश कर्म-ऋण के रूप में वंशजों को प्राप्त होता है।
पितृ दोष क्यों उत्पन्न होता है
जिस प्रकार हमें अपनी पारिवारिक रेखा से शारीरिक विशेषताएं, स्वभाव और गुण विरासत में मिलते हैं, उसी प्रकार पूर्वजों के अच्छे-बुरे कर्म भी हमें प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए, यदि पूर्वजों ने महिलाओं से जुड़े अनुचित कर्म किए हों, तो यह ऋण शुक्र ग्रह के क्षेत्र से जुड़कर कुंडली में पितृ दोष के रूप में प्रकट हो सकता है।

दो प्रकार के पितरों का प्रभाव
- अधोगति वाले पितर — पूर्वजों के गलत आचरण, संपत्ति के प्रति मोह या परिवार के किसी सदस्य को दिए गए अनुचित कष्ट के कारण यह दोष उत्पन्न होता है।
- उर्ध्वगति वाले पितर — सामान्यतः दोष नहीं देते, परंतु उनका अपमान होने या पारंपरिक रीति-रिवाजों की उपेक्षा करने पर पितृ दोष बन सकता है।
पितृ दोष के नौ प्रकार
नवग्रहों में से प्रत्येक ग्रह के आधार पर पितृ दोष के नौ प्रकार माने गए हैं। यह एक या एक से अधिक ग्रहों के संयोग से भी बन सकता है, जिसके अनुसार जीवन में अलग-अलग प्रकार की बाधाएं उत्पन्न होती हैं।
पितृ दोष के प्रमुख कारण
- पूर्वजों की पूजा न करना
- पीपल के वृक्ष को काटना या उसके नीचे अशुद्धता फैलाना
- माता-पिता की मृत्यु के बाद परिवार के जीवित सदस्यों का अपमान करना

कैसे पहचानें पितृ दोष
- जीवन में लगातार धन की कमी बने रहना
- वैवाहिक जीवन में बार-बार बाधाएं आना
- घर में निरंतर कलह का माहौल
- परिवार में बार-बार बीमारी
- भरसक प्रयास के बावजूद कर्ज न चुक पाना
- पति-पत्नी के बीच विवाद
पितृ दोष निवारण के उपाय
- पितृ पक्ष में विधिपूर्वक श्राद्ध करना
- गाय के लिए प्रतिदिन पहली रोटी निकालना
- घर में हमेशा स्वच्छ पेयजल रखना
- ग्रहण के समय पशुओं को भोजन कराना
- प्रतिदिन प्रातः-सायं भगवद्गीता का पाठ करना
- अपने कर्मों में शुद्धता और धैर्य बनाए रखना, जल्दबाजी न करना
