बीरभूम (पश्चिम बंगाल) का यह सिद्ध स्थल मां तारा की आराधना और तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है; महाशमशान, मुंडमालनी और द्वारका नदी से जुड़ी हैं कई अनूठी मान्यताएं
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित तारापीठ देशभर के 51 पवित्र शक्ति पीठों में से एक है। मां तारा की पूजा के लिए प्रसिद्ध यह स्थान तांत्रिकों के लिए सिद्धि प्राप्त करने की उपयुक्त जगह भी माना जाता है। तंत्र साधना में विश्वास रखने वालों के लिए इसका महत्व वैसा ही है, जैसा कामाख्या का।
वशिष्ठ मुनि का सिद्धासन
तारापीठ को भगवान राम के गुरु वशिष्ठ मुनि का सिद्धासन भी बताया जाता है। कहा जाता है कि महर्षि वशिष्ठ ने यहां मां तारा की आराधना कर सिद्धियां प्राप्त की थीं और उस समय मंदिर का निर्माण भी करवाया था। यह मंदिर बाद में जमीन में धंस गया, जिसके बाद ‘जयव्रत’ नामक एक व्यापारी ने इसे दोबारा बनवाया।

महाशमशान, मुंडमालनी और प्रेत-शिला
तारापीठ मंदिर मां के चमत्कारों के किस्सों के लिए मशहूर है। मुख्य मंदिर के सामने ही महाशमशान है, जहां तारा देवी का पादपद मंदिर है। इसे तंत्र साधना के लिए उपयुक्त माना गया है। यहां वामाखेपा सहित कई संतों की समाधियां भी हैं।
यहां मुंडमालनी नाम का स्थान भी है, जो एक शमशान स्थल है। मान्यता है कि काली मां अपने गले की मुंडमाला यहीं रखकर द्वारका नदी में स्नान करने जाती हैं। मान्यता यह भी है कि शमशान में जलने वाले शव का धुआं मंदिर के गर्भगृह तक जाता है, जिससे इस स्थान का महत्व और बढ़ जाता है।
मंदिर के पास स्थित प्रेत-शिला पर लोग पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम ने भी यहां अपने पिता का तर्पण और पिंडदान किया था।
द्वारका नदी की एक खासियत भी है: यह दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है, जबकि देश की अधिकांश नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती हैं।
मां तारा को क्यों कहा गया शिव की मां?
मंदिर में एक मूर्ति में मां तारा को भगवान शिव के बाल रूप को दूध पिलाते हुए दर्शाया गया है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय शिव ने जो विष ग्रहण किया था, उसकी जलन को मां तारा ने स्तनपान कराकर शांत किया था। इसी कारण उन्हें शिव की मां की उपाधि भी दी गई है।

सिद्धसंत वामाखेपा की कथा
जिस तरह रामकृष्ण परमहंस को मां काली ने दर्शन दिए थे, उसी तरह तारापीठ के सिद्धसंत वामाखेपा को देवी ने दिव्य ज्ञान दिया था। मान्यता है कि मां महाकाली ने शमशान में उन्हें दर्शन देकर कृतार्थ किया।
तारापीठ से करीब 2 किलोमीटर दूर आटला गांव में वामाखेपा का जन्म हुआ था। गरीबी और विपत्तियों से जूझते हुए उन्होंने मां की आराधना की और कम उम्र में सिद्धि प्राप्त की। कहा जाता है कि काली पूजा की रात साधना के दौरान मां तारा ने उन्हें दर्शन दिए। वामाखेपा के अनुसार, मां बाघ की खाल पहने थीं और उनके हाथों में तलवार, कंकाल की खोपड़ी, कमल का फूल और अस्त्र थे। पैरों में पायल थी, केश खुले थे और जीभ बाहर निकली हुई थी। पूरा वातावरण रोशनी और सुगंध से भर गया था।
मान्यता है कि महज 18 साल की उम्र में सिद्धि प्राप्त करने वाले इस संत ने 72 साल की उम्र में तारापीठ के महाशमशान में प्राण त्यागे। अघोरियों के लिए यह स्थान बेहद पवित्र माना जाता है।
श्रद्धालुओं की आस्था
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां आकर श्रद्धा से मनोकामना के लिए ध्यान करने वालों की इच्छा पूरी होती है। दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को मुंडमालनी देखने की सलाह भी दी जाती है
