भागदौड़ भरी ज़िंदगी में जब हम पितृपक्ष में कौए को भोजन देते हैं, तर्पण करते हैं या ब्राह्मण को भोजन कराते हैं, तो मन में अक्सर सवाल उठता है: क्या सच में हमारे दादा-दादी और पूर्वज आकर इसे ग्रहण करते हैं? या यह केवल एक परंपरा है?
इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हम गरुड़ पुराण की ओर चलते हैं। मान्यता है कि यह ग्रंथ स्वयं भगवान विष्णु ने अपने वाहन गरुड़ जी को मृत्यु और परलोक के रहस्य समझाने के लिए कहा था।
पहला चरण: मृत्यु के बाद के शुरुआती दिन
गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प के अनुसार मृत्यु के तुरंत बाद जीव यमलोक नहीं जाता।
पहले तेरह दिन: जीव अपने घर-परिवार के आसपास ही रहता है। शरीर छूट जाता है, पर वासना और मोह बने रहते हैं।
पिंडदान और तिलांजलि: इन दिनों परिवार द्वारा दिए गए पिंड और जल को आत्मा के लिए संबल माना गया है। इसके बाद जीव अपने कर्मों के अनुसार आगे की यात्रा पर जाता है।

दूसरा चरण: पितृलोक और पितृपक्ष की मान्यता
परंपरा में पितृलोक को चंद्रमा की कक्षा के समीप माना गया है, जिसके अधिपति अर्यमा हैं। मान्यता है कि पितर वहाँ सूक्ष्म रूप में रहते हैं और उन्हें वंशजों द्वारा दिया गया श्राद्ध-तर्पण ही तृप्ति देता है।
लोक-मान्यता के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के सोलह दिनों (पितृपक्ष) में पितर अपने घरों के द्वार पर आते हैं और देखते हैं कि वंशज उन्हें याद कर रहे हैं या नहीं।

तीसरा चरण: पितर भोजन कैसे ग्रहण करते हैं?
पितर शरीरहीन हैं, इसलिए वे अन्न सीधे नहीं खाते। मंत्रों के साथ किए गए तर्पण और पंचबलि के माध्यम से वह भाव और भोजन उन तक पहुँचता है। पंचबलि में गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और देवता/अतिथि के लिए भोजन निकाला जाता है।
कौआ: परंपरा में इसे यम का दूत और पितरों का प्रतीक माना गया है। कौए का भोजन ग्रहण करना पितरों की तृप्ति का संकेत समझा जाता है।
तर्पण का जल: काले तिल, जौ और कुशा के साथ दक्षिण दिशा की ओर मुख करके दिया गया जल पितरों को अर्पित माना जाता है।
श्रद्धा से स्मरण करने पर पितर आशीर्वाद देते हैं। इसी कारण कहा गया है कि श्राद्ध केवल कर्मकांड नहीं, कृतज्ञता का व्रत है।
पितृ दोष: कुंडली में इसका निर्माण कैसे होता है?
