ज्योतिष में मान्यता है कि यदि पूर्वजों का श्राद्ध-तर्पण न हो, या उनके प्रति अपेक्षित सम्मान न निभाया जाए, तो पितृ दोष माना जाता है। इसे कोई एक घटना नहीं, बल्कि कुंडली और परंपरा का विषय माना गया है। इसलिए किसी भी समस्या को अपने आप पितृ दोष घोषित न करें। जीवन की परेशानियों के अक्सर व्यावहारिक और चिकित्सीय कारण होते हैं। स्वास्थ्य, संतान या करियर की समस्या में पहले विशेषज्ञ से सलाह लें, और श्रद्धा के कार्य साथ-साथ करें।
सरल और सर्वमान्य उपाय
- तर्पण और श्राद्ध: पितृपक्ष और हर अमावस्या पर जल, काले तिल और कुशा से तर्पण करें।
- गौ-सेवा: अमावस्या को पितरों के निमित्त बना भोजन, चावल, बूरा और घी के साथ रोटी गाय को खिलाएँ।
- दान: अमावस्या पर पूर्वजों के नाम से दूध, चीनी, सफ़ेद वस्त्र और दक्षिणा मंदिर या योग्य ब्राह्मण को दें।
- सूर्य को अर्घ्य: तांबे के लोटे में जल, लाल फूल और रोली डालकर सूर्य को अर्घ्य दें और 11 बार “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का जाप करें।
- मंत्र-जाप: शिव-उपासना में “ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्” की एक माला प्रतिदिन जपने की परंपरा है।
- पाठ: श्रीमद्भागवत, सुंदरकांड, दुर्गा सप्तशती या हरिवंश पुराण का पाठ या श्रवण।
- वृक्षारोपण: मंदिर-परिसर में पीपल या बरगद लगाएँ और उसकी देखभाल करें। यह पर्यावरण के लिए भी उत्तम कर्म है।
- पीपल की परिक्रमा: पितृपक्ष में श्रद्धा से पीपल की परिक्रमा करें।
सबसे बड़ा उपाय: बड़ों का सम्मान
शास्त्र और परंपरा का सार यही है कि जीवित माता-पिता, बुज़ुर्गों और परिवार की स्त्रियों का आदर पितरों की प्रसन्नता का सबसे सीधा मार्ग है। मृत पूर्वजों की शांति की शुरुआत घर के जीवित बड़ों की सेवा से होती है। जिनसे जीवनकाल में मन-मुटाव रहा हो, उनसे क्षमा-भाव के साथ श्राद्ध करने से भी मन को शांति मिलती है।
पितृ दोष के उपाय भय से नहीं, श्रद्धा और कृतज्ञता से किए जाने चाहिए। कुंडली के अनुसार विशेष शांति-पूजा करवानी हो तो अपने कुल-पुरोहित या किसी विश्वसनीय आचार्य से परामर्श करें, और किसी से भारी खर्च वाले अनुष्ठान के लिए दबाव में न आएँ।

