1. धनतेरस: शंख का चयन और शोधन
- धनतेरस के दिन एक अच्छा, बड़ा शंख लाएँ। दक्षिणावर्ती शंख मिल जाए तो सर्वोत्तम है।
- शोधन: शंख को गोमूत्र में 108 बार डुबोकर निकालें।
- अंतिम शोधन के बाद इसे पोंछकर सुखा लें।
- पंचामृत स्नान: गंगाजल, गोघृत, मधु, मिश्री और दही से स्नान कराएँ।
ध्यान रखें: इस पंचामृत में तुलसी दल नहीं डालना है।
- स्नान के बाद शंख पर गोघृत का लेपन करें।
- अपनी श्रद्धा और सुविधा के अनुसार पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार से पूजन करें। धूप, दीप और आरती भी करें।
- भाव: मन में यह भाव बनाए रखें कि आप शंख की नहीं, साक्षात् लक्ष्मी-नारायण की पूजा कर रहे हैं। आप याचक बनकर उनसे स्थायी निवास की प्रार्थना कर रहे हैं।

2. शंख की स्थापना
- घर में पवित्र स्थान पहले ही तय कर लें। शंख अगले वर्ष की धनतेरस तक वहीं विराजमान रहेगा।
- उस स्थान पर थाली या लकड़ी के पटरे पर हल्दी से विनायक यंत्र बनाएँ। सक्षम साधक चाँदी का यंत्र बनवा सकते हैं या प्राणप्रतिष्ठित यंत्र भी ले सकते हैं।
- यंत्र बनाते समय यह मंत्र निरंतर जपें: वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ - यंत्र पर शंख स्थापित करें और 11 माला इस मंत्र की जपें: ॐ गं गणपतये सर्वविघ्नहराय सर्वाय सर्वगुरवे लम्बोदराय ह्रीं गं नमः॥
अब आपका श्री शंख पूजा के लिए तैयार है।

3. धनतेरस से दीपावली तक: शंख गायत्री साधना
- शुभ समय: उपाय शुरू करने का शुभ समय तय करें। धन संबंधी उपायों के लिए शुक्र की होरा सर्वाधिक उपयुक्त मानी गई है।
- शंख के सामने थाली में चावल और नागकेसर लेकर बैठें।
- शंख गायत्री मंत्र का जप करें। हर जप के साथ हवन की आहुति की तरह चावल और नागकेसर शंख में छोड़ते जाएँ: ॐ शंखाय च विद्महे पवमानाय च धीमहि, तन्नो शंखः प्रचोदयात्॥
- जप की संख्या निश्चित नहीं है। लक्ष्य यह है कि दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजन के समय शंख चावल और नागकेसर से पूरा भर जाए।
- यह काम दीपावली की पारंपरिक पूजा से पहले या बाद में, कभी भी पूरा किया जा सकता है।
- पूजा के अंत में शंख को इसी स्थिति में स्वच्छ कपड़े से ढककर रखें। फिर शंख गायत्री मंत्र जपें और उसमें से चावल उठाकर उसी में छोड़ दें। इसके बाद शंख को निरंतर ढका रखें।
फल: शास्त्र मान्यता के अनुसार इस उपाय से पूरे वर्ष परिवार में सुख, वैभव और लक्ष्मी-नारायण की कृपा बनी रहती है।
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