जब पूरे देश के कई हिस्सों में व्रत का मतलब “सात्विक और बिना मांस-मछली का भोजन” माना जाता है, तब मिथिला की माताएँ जितिया व्रत से पहले माछ (मछली) और मरुआ (मड़ुआ/रागी) की रोटी खाकर व्रत की शुरुआत करती हैं। बाहर के लोगों को यह अजीब लग सकता है, पर मिथिला में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
तो सवाल उठता है: ऐसा क्यों?
मिथिला: शाक्त-शैव परंपरा की भूमि
मिथिला, बंगाल, असम, उड़ीसा के कुछ भाग और कश्मीर के कुछ क्षेत्र शाक्त परंपरा से गहराई से जुड़े रहे हैं। यहाँ अधिकतर परिवारों की इष्ट देवी माँ जगदम्बा हैं और शिव परम पूज्य हैं। इसी कारण यहाँ का लोकाचार, खान-पान और व्रत-त्योहार के नियम वैष्णव क्षेत्रों से अलग हैं। हर पर्व का अपना भोजन-विधान है, और जितिया में माछ-मरुआ उसी परंपरा का हिस्सा है।

“शास्त्र में कहाँ लिखा है?” देशाचार ही प्रमाण है
कई लोग पूछते हैं कि क्या किसी वेद या पुराण में सीधे लिखा है कि “जितिया में माछ खाओ”? सच यह है कि यह मिथिला का लोकाचार है, और हमारी परंपरा में कहा गया है:
आचारः परमो धर्मः आचारः परमं तपः।
देशाचारं कुलाचारं शास्त्राचारं च पालयेत्॥
यानी देश, कुल और परंपरा का आचार भी धर्म का ही अंग है। जो परंपरा पीढ़ियों से निभाई जा रही है, वही उसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
माछ-मरुआ के पीछे तीन बड़े कारण
1. मछली: जीवन और संतान का प्रतीक
भारतीय परंपरा में मत्स्य को जीवन, प्रजनन और वंश-वृद्धि का प्रतीक माना गया है। भगवान विष्णु का पहला अवतार भी मत्स्यावतार है। मिथिला में मछली को शुभ और मांगलिक माना जाता है, इसलिए विवाह, पर्व और शुभ अवसरों पर भी वह थाली में रहती है।
जितिया की कथा में जीमूतवाहन, चील और सियारिन का प्रसंग आता है। माताएँ नहाय-खाय में माछ खाते हुए यह भाव रखती हैं कि जैसे मछली जल में जीवित और सुरक्षित रहती है, वैसे ही मेरी संतान भी दीर्घायु और सुरक्षित रहे।

2. मरुआ (रागी): शक्ति और सहनशीलता का अन्न
जितिया लगभग 36 घंटे का निर्जला व्रत है, जो सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। इसलिए व्रत से पहले ऐसा भोजन ज़रूरी है जो लंबे समय तक ऊर्जा दे। रागी (मड़ुआ) इसी के लिए जानी जाती है:
यह फाइबर, कैल्शियम और आयरन से भरपूर है।
यह देर से पचती है, इसलिए लंबे उपवास में भूख और कमज़ोरी कम लगती है।
आयुर्वेद में इसे बलवर्धक अन्न माना गया है।
भावनात्मक रूप से भी मरुआ का अर्थ गहरा है। यह गरीब का अन्न है, अहंकार का नहीं, सहनशीलता का प्रतीक है। माँ मन में यही भाव रखती है: “मैं साधारण अन्न खाकर कठिन तप करूँगी, ताकि मेरी संतान सुखी रहे।”
3. ओठगन की परंपरा
मिथिला में व्रत से पहले की रात या भोर में किए जाने वाले भोजन को ओठगन कहते हैं। इसमें माछ और मरुआ की रोटी खाने का रिवाज है। इसी से यह लोकप्रिय कहावत निकली:
“जितिया में माछ-मरुआ जो खाय, ओकर पुत्र अजर-अमर हो जाय।”
शाकाहारी माताओं के लिए विकल्प
जो माताएँ शाकाहारी हैं, उनके लिए भी परंपरा में रास्ता है। वे माछ की जगह नोनी साग और कर्मी साग खा सकती हैं। लोकमान्यता में इनका फल भी माछ के समान माना गया है। यानी परंपरा कठोर नहीं, सबको साथ लेकर चलने वाली है।
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