आश्विन कृष्ण अष्टमी को माताएँ संतान की दीर्घायु के लिए जीवित्पुत्रिका (जितिया) व्रत करती हैं। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है, क्योंकि यह निर्जला होता है। हर वर्ष पंचांगों में तिथि-गणना के अंतर से तारीख़ को लेकर उलझन रहती है। इस लेख में मिथिला पंचांग के अनुसार पूरा कार्यक्रम दिया गया है।
जितिया 2026: मिथिला पंचांग के अनुसार पूरा कार्यक्रम
| दिन | तिथि | क्या करें |
|---|---|---|
| पहला दिन | 2 अक्टूबर 2026, शुक्रवार | नहाय-खाय; रात्रि के अंतिम प्रहर में ओठगन |
| दूसरा दिन | 3 अक्टूबर 2026, शनिवार | जीमूतवाहन व्रत (निर्जला); सायं पूजन |
| तीसरा दिन | 4 अक्टूबर 2026, रविवार | प्रातः 7:38 बजे के बाद पारण |
तीन दिनों की विधि
1. नहाय-खाय (2 अक्टूबर)
व्रती स्नान के बाद शुद्ध, सात्विक भोजन करती हैं। यहीं से व्रत का संकल्प और संयम शुरू माना जाता है।
2. ओठगन (2 अक्टूबर की रात का अंतिम प्रहर)
व्रत शुरू होने से पहले, सूर्योदय से पूर्व, रात्रि के अंतिम प्रहर में परंपरा के अनुसार हल्का भोजन (ओठगन) करने की रीति है। इसके बाद अन्न-जल का त्याग हो जाता है। ओठगन का स्वरूप परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
3. जीमूतवाहन व्रत (3 अक्टूबर)
पूरे दिन निर्जला उपवास रखा जाता है। सायं भगवान जीमूतवाहन की गंध, अक्षत, धूप, दीप और पुष्प से पूजा होती है और व्रत कथा सुनी जाती है।
4. पारण (4 अक्टूबर, प्रातः 7:38 बजे के बाद)
पारण का समय तिथि-समाप्ति पर निर्भर है, इसलिए पत्रिका में बताए गए 7:38 बजे के बाद ही व्रत खोलें। पारण से पहले स्नान और सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है।

शास्त्र क्या कहता है?
जीवित्पुत्रिका व्रत के निर्णय में शास्त्र के कुछ मुख्य सूत्र हैं:
- व्रत आश्विन कृष्ण अष्टमी को किया जाता है: “आश्विने बहुले पक्षे तिथिश्चाष्टमी शुभा।”
- सप्तमी-विद्ध अष्टमी का निषेध है: “वर्जनीया प्रयत्नेन सप्तमीसहिताष्टमी। अन्यथा फलहानिः स्यात् सौभाग्यं नश्यति ध्रुवम्॥”
- पारण नवमी में किया जाता है: “पारणं नवमीदिने।”
तिथि के आरम्भ और समाप्ति का सटीक समय पंचांग-गणना पर निर्भर करता है, इसलिए हर पंचांग परम्परा अपने गणित के अनुसार व्रत का दिन निश्चित करती है।
(स्रोत: ज्योतिष वाटिका पत्रिका, मिथिला पंचांग के अनुसार)

