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माँ सती की उंगली गिरने से प्रकट हुआ दिव्य शक्तिपीठ

तीर्थराज प्रयागराज की पावन धरती पर स्थित माँ ललिता देवी शक्तिपीठ श्रद्धा, भक्ति और दिव्य शक्ति का अद्भुत संगम है। मान्यता है कि यहाँ माँ सती की उंगली गिरी थी, जिसके कारण यह स्थान 51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान रखता है। संगम स्नान के बाद माँ ललिता के दर्शन करने से भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

मंदिर की दीवारें इसकी प्राचीनता को दशार्ती हैं:

मंदिर के बाहरी और भीतरी दीवारें इसकी प्राचीनता और भव्यता को दशार्ती हैं. इसके गर्भ गृह में पूर्व दिशा में मां की प्रतिमा स्थापित है. देवी कवच में माता ललिता को हृदय की रक्षा करने वाली शक्ति कहा गया है. इनके दर्शन और ध्यान करने से हृदय की पीड़ा शांत होती है. नवरात्र में मंदिर परिसर में सैकड़ों भक्त जन ललिता सहस्रनाम, दुर्गा सप्तशती, देवी कवच का पाठ कर माता की पूजा करते हैं. शारदीय नवरात्र में प्रतिदिन मां ललिता देवी के दरबार को ताजे और रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है. नियमित रूप से सुबह और संध्याकालीन आरती की जाती है.

अष्टमी के दिन छप्पन भोग लगने का है बड़ा महत्व:

अष्टमी के दिन माता रानी को छप्पन भोग अर्पित किए जाते है. मां ललिता का दर्शन मात्र कर लेने से बड़े से बड़ा संकट कट जाता है और हृदय से कामना करने पर भक्त की हर मनोकामना पूरी होती है.

भक्तों की होती है सभी मनोकामनाएं पूरी:

यहां आए भक्तों का कहना है कि यह सदैव से यहां पर पूजन करते चले आए हैं और माता से जो भी प्रार्थना की है, वह पूरी हुई है और नवरात्र के दिनों में तो जो पूजा अर्चन किया जाता है. उसका करोड़ों गुना फल मिलता है.
मां ललिता देवी की उपासना के लिए महर्षि दत्तात्रेय ने श्रीयंत्र का आविष्कार किया था। शास्त्रों में भी श्रीयंत्र को भगवान शिव और शिवा का रूप माना गया है। इसलिए आज भी माता की पूजा श्रीयंत्र में की जाती है, जिसे श्रीचक्र भी कहते हैं। इसी को ध्यान में रखकर ललिता देवी मंदिर को श्रीयंत्र के आकार की तरह बनाया गया है।

माँ ललिता को त्रिपुरसुंदरी, राजराजेश्वरी और जगतजननी के रूप में पूजा जाता है। भक्तों का विश्वास है कि माँ के चरणों में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। नवरात्र में यहाँ दुर्गा सप्तशती, ललिता सहस्रनाम और देवी कवच के पाठ से पूरा मंदिर भक्तिमय हो उठता है।

108 फीट ऊँचे इस भव्य मंदिर में प्रतिदिन मंगला और संध्या आरती होती है। माँ को खीर, चना और पंचमेवा का प्रिय भोग अर्पित किया जाता है। कहा जाता है कि माँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती स्वयं माँ ललिता के चरण स्पर्श कर प्रवाहित होती हैं, इसी कारण उन्हें “प्रयाग की महारानी” भी कहा जाता है।

 

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