“मीरा कहै प्रभु हरि अविनाशी, तन मन ताहि पटै रे।”
मीरा का यह वचन केवल भक्ति का गीत नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव का उद्घोष है। वे कहती हैं कि जब से उन्हें अविनाशी प्रभु का साक्षात्कार हुआ, तब से तन, मन और आत्मा के बीच का हर भेद मिट गया। भीतर का द्वंद्व समाप्त हो गया और जीवन अखंड हो गया।
मनुष्य का सबसे बड़ा दुख यह है कि उसकी इच्छाएँ अनेक दिशाओं में बिखरी होती हैं। एक इच्छा धन चाहती है, दूसरी पद, तीसरी सम्मान, चौथी भोग और पाँचवीं स्वर्ग की कामना करती है। इन अनगिनत इच्छाओं के कारण मन भी टुकड़ों में बँट जाता है। जब मन बिखरा हो, तब शांति और आनंद कैसे मिल सकते हैं?

सभी संतों का संदेश एक ही है—जीवन में एक ही आकांक्षा रखो। जब सारी इच्छाएँ एक होकर केवल परमात्मा को पाने की चाह में बदल जाती हैं, तभी मन एकाग्र होता है। यही वास्तविक योग है, यही सच्ची साधना है।
जैसे छोटी-छोटी नदियाँ मिलकर गंगा बनती हैं और अंततः सागर तक पहुँच जाती हैं, वैसे ही जीवन की सभी इच्छाएँ जब प्रभु-प्राप्ति की एक ही धारा में समाहित हो जाती हैं, तब साधक सहज ही परम सत्य तक पहुँच जाता है।
यही अभीप्सा है—वह अवस्था जहाँ हर छोटी इच्छा विलीन होकर केवल एक ही पुकार बन जाती है—प्रभु मिलन।
जब जीवन में केवल एक धुन रह जाती है, तब भीतर का विभाजन समाप्त हो जाता है। तन, मन और आत्मा एक हो जाते हैं। वहीं से आरंभ होती है सच्ची शांति, सच्चा आनंद और परमात्मा से मिलन की यात्रा।
संदेश:
जितनी अधिक इच्छाएँ, उतना अधिक बिखराव। जितनी एकाग्र साधना, उतना निकट प्रभु का साक्षात्कार।
