प्रकृति लगातार संकेत दे रही है, और ये संकेत अब पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक होते जा रहे हैं। जंगल सिकुड़ रहे हैं, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, और प्राकृतिक संसाधन किसी न किसी वजह से लगातार क्षीण होते जा रहे हैं। यह सिर्फ पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में इंसानी बस्तियों के अस्तित्व का सवाल बनता जा रहा है।
इसी खतरे की जद में भारत भी बड़े पैमाने पर आ चुका है। अनुमान है कि देश के 12 प्रमुख तटीय शहर लगभग तीन फुट पानी में डूब सकते हैं। यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि आपस में जुड़ी हुई घटनाओं की एक कड़ी है — पेड़ कटते हैं, जंगलों में आग लगती है, इससे तापमान बढ़ता है, ग्लेशियर और ध्रुवीय बर्फ पिघलती है, और नतीजतन समुद्र का जलस्तर साल-दर-साल ऊपर उठता जाता है।

चेतावनी का वैज्ञानिक आधार
यह चेतावनी किसी अटकल पर नहीं, बल्कि इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की एक विस्तृत रिपोर्ट पर आधारित है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण पर लगाम नहीं लगाई गई, तो वैश्विक औसत तापमान में 4.4 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि अगले दो दशकों के भीतर ही तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाने की आशंका है। तापमान में यह उछाल सीधे ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज करेगा, जिसका असर मैदानी और समुद्री दोनों इलाकों पर पड़ेगा।
इसी रिपोर्ट के आधार पर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने एक खास “सी-लेवल प्रोजेक्शन टूल” तैयार किया है, जिससे वैज्ञानिक अब दुनिया भर के तटीय देशों के लिए समुद्री जलस्तर बढ़ने का सटीक आकलन कर पा रहे हैं। यह अपनी तरह का पहला वैश्विक आकलन टूल है।
किन भारतीय शहरों पर सबसे बड़ा खतरा?
चेन्नई, कोच्चि और भावनगर जैसे शहर उन 12 प्रमुख तटीय शहरों में शामिल हैं जिन पर बढ़ते समुद्री जलस्तर का सबसे गंभीर खतरा मंडरा रहा है। पश्चिम बंगाल का किडरोपोर क्षेत्र, जहाँ अब तक इस तरह के खतरे की आशंका कम मानी जाती थी, वहाँ भी 2100 तक लगभग आधा फुट पानी बढ़ने का अनुमान जताया गया है।
चिंता की बात यह भी है कि इन तटीय इलाकों में देश के कई बड़े बंदरगाह, व्यापारिक केंद्र और मछली-तेल कारोबार के प्रमुख ठिकाने स्थित हैं। समुद्री जलस्तर में इजाफा सिर्फ ज़मीन ही नहीं, बल्कि इन शहरों की पूरी आर्थिक व्यवस्था को भी गहरी चोट पहुँचा सकता है।
195 देशों से जुटाए गए मौसम और तापमान के आँकड़ों के विश्लेषण पर आधारित इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जो अत्यधिक लू पहले हर पचास साल में एक बार आती थी, अब वह हर दस साल में दस्तक दे रही है — यानी धरती के गर्म होने की रफ्तार साफ तौर पर बढ़ चुकी है।

भारत पर मंडराता संकट
भारत में जलवायु परिवर्तन के असर की शुरुआत 1970 के दशक से ही मानी जाती है, और अब इसके नतीजे सामने आने लगे हैं। समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, तटीय शहरों पर खतरा गहराता जा रहा है, और इसकी जड़ में है ग्लेशियरों का लगातार पिघलना। इसकी झलक अभी से दिखनी शुरू हो चुकी है — कहीं नदियाँ उफान पर हैं, तो कहीं पहाड़ धराशायी हो रहे हैं और भीषण बाढ़ के दृश्य सामने आ रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में भी आगाह किया गया है कि हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों से बनी झीलों के बार-बार फटने से निचले तटीय इलाकों में गंभीर बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। आने वाले दशकों में देश की सालाना औसत वर्षा में भी बढ़ोतरी की आशंका है, खासकर दक्षिणी राज्यों में अत्यधिक बारिश की संभावना जताई गई है।
अब सोचने का नहीं, करने का समय है
1970 के दशक से शुरू हुआ तापमान बढ़ने का यह सिलसिला अब भी थमा नहीं है, और 2019 में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर खास तौर पर तेज़ी से बढ़ा। वैज्ञानिक समय रहते चेतावनी दे चुके हैं। अब सरकारों के साथ-साथ हम सबकी भी यह ज़िम्मेदारी है कि जलवायु परिवर्तन के इस संकट को थामने के लिए ठोस और तत्काल कदम उठाए जाएँ।
अगर इंसान अभी नहीं संभला, तो प्रकृति की यह चेतावनी कल किसी वास्तविक जलप्रलय में बदल सकती है। यह सोचने का नहीं — ठोस कार्रवाई का समय है।
