बहुत से लोग 84 लाख योनियों की दुश्वारियों से भरे जन्मों से भयभीत होकर पाप की इच्छाओं के बाबजूद बुरे कर्मो से दूर रहते है। ऐसे लोगों से कहना चाहूंगा आंतरिक इच्छाओं को केवल भयभीत होने के कारण प्रगट नहीं कर पा रहे हो तब यह जान लेना आपके पुनर्जन्म मानव का सम्भव नहीं है।
84 के भय से मुक्त तुम्हें कोई नहीं कर सकता, स्वयं ही कर सकते हो। भय वास्तविक है। तुम चाहोगे कि मैं तुमसे कह दूं कि नहीं जी, कोई चिंता की बात नहीं है, चौरासी कोटि योनियां वगैरह नहीं होतीं–ताकि तुम निश्चित हो जाओ और लग जाओ अपनी वासनाओं की दौड़ में फिर।
सत्य यही है कि प्रकृति का चक्र वैज्ञानिक है, वह घूम रहा है। तुमने अगर मनुष्य होने का लाभ न उठाया तो तुम मनुष्य होने का अधिकार खो देते हो। यह सीधा-सा गणित है। आखिर मनुष्य होने का हक तुम्हें मिला है–किसी कारण से न।
ब्रज के वैष्णव संत से किसी ने पूछा, संन्यस्त होना चाहता हूँ-उसने कहा कि आपको देखकर, आपकी यह दिव्य कांति, आपका यह अपूर्व अपार्थिव सौंदर्य–मेरे मन में भी बड़ी गहन आकांक्षा उठी है। मगर मैंने कभी इसके पहले कभी सोचा भी नहीं था। और मैं कभी धर्म इत्यादि में उत्सुक भी नहीं रहा। पाखंडियों से मैं जरा दूर ही दूर रहा। मेरे पिता माता भी मुझे अगर कभी ले जाना चाहते हैं तो मैं बच जाता हूं हजार बहाने करके। प्रवचनों की बातें सुन कर मुझे सिर्फ सिरदर्द हो जाता है और ऊब आती है। मगर आपको देखकर मैं बड़ा उत्सुक हो गया हूं और एक भाव उठता है भीतर कि मैं दीक्षित हो जाऊं। मगर यह मेरी समझ में नहीं आता कि अनायास! पीछे कोई सिलसिला नहीं है, कोई श्रृंखला नहीं है। अनायास! इतनी बड़ी बात की मेरे मन में कैसे आ गई!

वैष्णवचार्य ने आंख बंद की और उसे कहा : “युवक, तुझे पता नहीं, तू पिछले जन्म में हाथी था। जंगल में आग लग गई थी। उसी बीच एक खरगोश तेरी शरण में आया था। जिसे तूने बचाया था अपनी जान देकर। वह घड़ी ऐसी थी कि सारा जंगल आग से लगा था। वह मौका ऐसा था कि तुझे एक बात दिखाई पड़ी हम सभी जीवन के लिए भागे जा रहे हैं यह खरगोश भी बेचारा भागा जा रहा है। मैं थक गया, मैं बड़ा हाथी हूं, तो यह भी थक गया है। और यह किस निश्चिंतता से मेरे पैर के नीचे बैठा है जो मैंने उठाया हुआ है; अब मैं रखूंगा पैर के नीचे तो यह मर जाएगा।
वह घड़ी ऐसी थी कि तू अपने जीवन के लिए इतना उत्सुक था, तेरी जीवटता इतनी प्रबल थी कि बच जाऊं, कि तुझे यह लगा कि जैसे मैं बचना चाहता हूं वैसे सभी बचना चाहते हैं। तुझे बड़ा बोध हुआ। और तू पैर वैसा ही उठाए खड़ा रहा और वह खरगोश नीचे निश्चिंत बैठा रहा। जब खरगोश हट गया तब तूने पैर नीचे रखा। लेकिन पैर अकड़ गया था। तू नीचे न रख पाया, गिर पड़ा। खरगोश तो बच कर निकल गया लेकिन तू उस जंगल में लगी आग में जल कर मर गया। लेकिन मरते वक्त तेरे मन में बड़ी तृप्ति थी, एक बड़ी शांति थी, एक अपूर्व उल्लास था, एक आनंद का भाव था कि मैंने खरगोश को नहीं मारा चलो मैं मर गया, ठीक। उसका फल है कि तू मनुष्य हुआ।’
तूने वह जो करुणा दिखाई, उस करुणा के कारण तू मनुष्य हुआ। उसी करुणा के कारण तेरे भीतर यह बीज पड़ गया।
मैं तुमसे कहता हूं कि तुम मनुष्य हो, यह अकारण नहीं है। कुछ किया होगा। कुछ हुआ होगा। अनंत अनंतयात्रा-पथ पर तुमने अर्जन किया है मनुष्यत्व। यह अर्जित है। लेकिन यह अवसर अवसर ही है। यह तुम्हारी कोई शाश्वत संपदा नहीं है। तुम इसके मालिक नहीं हो गए हो। यह क्षणभंगुर है। यह आज है और कल चला जाएगा। जैसे अर्जित किया है वैसे ही गंवा भी सकते हो।
कब कौन हाथी से मुनष्य जन्म लेगा, या मनुष्य से हाथी आपके भाव से प्रेरित विचार रूपांतरित कर्म ही तय करेंगे।
यही 84 योनियों का चक्र है। बाहरी बातें नहीं अंतरात्मा से प्रगट कर्म ही तय करेंगे कि आप कौन हो और क्या होओगे। प्रकृति के विज्ञान में पाखंड काम नहीं आता।
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