युद्धभूमि में ध्यान? यह कैसा उपदेश!
गीता का छठा अध्याय साधकों और मुमुक्षुओं के लिए बहुत मूल्यवान है, क्योंकि इसमें ध्यान योग की चर्चा है। इसे आत्मसंयम योग भी कहा गया है।
आश्चर्य होता है कि जहाँ शंख बज रहे हैं और सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं, वहाँ ध्यान का उपदेश दिया जा रहा है। विषादग्रस्त अर्जुन को मोहमुक्ति, अनासक्ति और आत्मा की अमरता का उपदेश देना तो समझ आता है। पर रणभूमि में ध्यान योग?
यहाँ यह स्मरण रहे कि यह ध्यान अर्जुन को शर-संधान में एकाग्र करने के लिए नहीं है। इसके आयाम गहरे आध्यात्मिक हैं। मुण्डकोपनिषद् में प्रणव (ओंकार) को धनुष, आत्मा को बाण और ब्रह्म को लक्ष्य कहा गया है। ओंकार की आकृति भी धनुष जैसी दिखती है। गीता भी तो उपनिषद् ही है, स्मृति-काव्य के भीतर छिपाई हुई।

छठे अध्याय की पाँच प्रमुख सीखें
1. संन्यासी वह है जो फल का त्याग करे, कर्म का नहीं
पहले ही श्लोक में कहा गया है कि जो कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्य कर्म करता है (अनाश्रितः कर्मफलं), वही संन्यासी और योगी है। क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं होता। गीता ने संन्यासी की यह परिभाषा इतनी बार दी है कि इसमें किसी दुविधा की गुंजाइश नहीं।
2. योगी का स्वरूप (श्लोक 10)
योगी एकान्तवासी, संयत चित्त वाला, आशारहित और संग्रहरहित होता है।
3. ध्यान की विधि (श्लोक 13)
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥
शरीर, मस्तक और गर्दन को सीधा और अचल रखकर, स्थिर बैठकर, नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि टिकाई जाती है। यह अर्धोन्मीलित नेत्र की दशा है। इसमें संसार अप्रस्तुत हो जाता है और दृश्य का संस्कार मन पर नहीं बनता। आँखें आधी खुली रहती हैं, इसलिए तन्द्रा भी नहीं आती। ध्यान आज्ञाचक्र पर केंद्रित होता है।
4. युक्तचेष्टा: संतुलन का सूत्र (श्लोक 16-17)
न बहुत खाने वाले का योग सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का। यही बात सोने-जागने पर भी लागू है। जिसका आहार-विहार और कर्म यथायोग्य है, उसी का योग सिद्ध होता है। यही गीता का मध्यम मार्ग है, जिसकी महिमा तथागत बुद्ध ने भी गाई। वीणा के तार न बहुत कसे हों, न बहुत ढीले।

5. आत्मसंस्थं मनः कृत्वा (श्लोक 25)
धैर्ययुक्त बुद्धि से धीरे-धीरे उपरति को प्राप्त होकर मन को आत्मा में सम्यक् रूप से स्थित करना, यह इस अध्याय की सबसे मूल्यवान सीख है। इसी श्लोक की उपमा है कि योगी का चित्त निर्वात स्थान में रखे दीपक की निष्कम्प लौ जैसा होता है (यथा दीपो निवातस्थो, श्लोक 19)।
“मन चंचल है” तो क्या करें?
अर्जुन हम सबकी ओर से वही कहता है जो हर साधक महसूस करता है कि मन तो बड़ा चंचल और हठी है, इसे वश में करना हवा को बाँधने जैसा है। श्रीकृष्ण का उत्तर सरल है:
“अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आ जाता है।” (श्लोक 33-34)
कोई जादू नहीं, कोई शॉर्टकट नहीं। बस निरंतर अभ्यास और अनासक्ति।
