तलाक केवल एक जोड़े को अलग नहीं करता, यह दो परिवारों के बीच भी दूरी ला देता है। इसी कारण समाज में इसे बहुत पीड़ादायक स्थिति माना जाता है। हिंदू परंपरा में गृहस्थ जीवन को पवित्र बंधन माना गया है, इसलिए वैवाहिक संबंध टूटना गहरे दुख का विषय समझा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र में कुंडली के कुछ भावों, ग्रहों की स्थिति और युति को वैवाहिक जीवन से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि कुछ विशेष ग्रह-स्थितियां दांपत्य जीवन में तनाव या अलगाव की संभावना बना सकती हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में “तलाक योग” कहा जाता है।
कुंडली में तलाक योग कैसे बनता है?
ज्योतिष के अनुसार, वैवाहिक जीवन में लगातार परेशानी हो तो माना जाता है कि प्रेम और दांपत्य सुख के कारक ग्रहों की स्थिति कमजोर या प्रतिकूल है। पारंपरिक ज्योतिष में इन स्थितियों को विशेष रूप से देखा जाता है:
1. लग्नेश, सप्तमेश और चंद्रमा की स्थिति
इन तीनों का प्रतिकूल स्थिति में होना वैवाहिक जीवन में कठिनाई का संकेत माना जाता है।
2. सप्तम भाव के स्वामी की स्थिति
सप्तम भाव का स्वामी छठे या बारहवें भाव में हो, तो पति-पत्नी के बीच दूरी की स्थिति बन सकती है।
3. सप्तम भाव में सूर्य, राहु और शनि
यदि ये ग्रह सातवें भाव में हों और उन पर शुक्र का प्रभाव हो, या शुक्र की दृष्टि बारहवें भाव पर पड़ रही हो, तो इसे अलगाव का योग माना जाता है।

4. सप्तमेश और बारहवें भाव के स्वामी का संबंध
दोनों के बीच राशि संबंध बनने पर भी तलाक योग की बात कही जाती है।
5. चतुर्थ या सप्तम भाव के स्वामी की स्थिति
इनमें से किसी का छठे, आठवें या बारहवें भाव में बैठना प्रतिकूल माना जाता है।
6. चतुर्थ भाव पर पाप ग्रह का प्रभाव
चतुर्थ भाव में पाप ग्रह का बैठना या उस पर पाप ग्रह की दृष्टि पड़ना दांपत्य सुख को प्रभावित करने वाला माना जाता है।
7. शुक्र के साथ पाप ग्रह
शुक्र के साथ छठे, आठवें या बारहवें भाव में पाप ग्रह हों, तो संबंधों में टूटन की आशंका बताई जाती है।
8. सप्तमेश, लग्नेश और अष्टमेश की स्थिति
इनका बारहवें भाव में एक साथ होना भी अलगाव का संकेत माना जाता है।
9. नीच या कमजोर शुक्र
प्रेम के कारक ग्रह शुक्र का नीच राशि में होकर छठे, आठवें या बारहवें भाव में स्थित होना अलगाव का योग बनाने वाला कहा गया है।
एक जरूरी बात: योग का अर्थ निश्चित परिणाम नहीं
कुंडली में ऐसे योग दिखने का अर्थ यह नहीं कि तलाक होना तय है। ज्योतिष में किसी योग का फल पूरी कुंडली, ग्रहों के बल, दशा-अंतर्दशा और अन्य शुभ योगों को देखकर ही तय किया जाता है। किसी एक स्थिति को देखकर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है, और सही विश्लेषण के लिए पूरी कुंडली किसी योग्य ज्योतिषाचार्य को दिखानी चाहिए।
साथ ही यह भी याद रखें कि वैवाहिक जीवन की सफलता केवल ग्रहों पर नहीं, व्यवहार पर भी निर्भर करती है।
